है मिथ्या घोष शान्ति का , मिथ्या है क्रांति का अवरोध ,
समर अभी थमा नहीं है , मत पाल तू  विश्राम का बोध ,
रण शेष है , मरण शेष है , शेष है अरि मुंडों का शोध ,
कर लक्ष रिपु शीश का , कर उन पर शर वृष्टि अमोघ , 1

ले गंधक शिराओं में धमनियों में बारूद भर ,
सांसों  में तूफ़ान और पसलियों में समूद  भर ,
उठा  पिनाक और प्रत्यंचा का  निनाद कर ,
टूट पड़ श्वान समूह पर तू भीषण सिंघनाद कर , 2

सौगंध उठा मिटने न देगा तू अपने पुरखों की थाती को ,
प्रतिकार करेगा , लहू पियेगा , चीर भेड़ियों की छाती को ,
उठ रण सिंह नाद कर ! और बता दे श्वान प्रजाति को ,
भूला नहीं है तू अभी , शीश कटाने की परिपाटी को , 3

 फिर एक बार पांचजन्य को गूँज जाने दे  ,
शिव को पिनाक और पार्थ को गांडीव उठाने दे  ,
सकल रण  भूमि को रिपु रक्त से नहाने दे ,
बहा दे शोणित सरिता, रिपु मुंडों को बह जाने दे ,  4

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