भारती के किरीट पर गहन तम है, कलुषित अँधियारा है ,
हिमगिरि शिखरों को लांघ , बैरी ने तुझको ललकारा है ,
कश्यप की पावन धरती में , तेरी बहनों का सिन्दूर उतरा है ,
अमरनाथ की धरा पे तेरे बांधवों की बहाई शोणित धारा है, 1
घोर तपस्वी तू भगीरथ सा , महा पराक्रमी तू परशुराम ,
रण में वधा रावण जिसने , तेरे रोम रोम बसता वो राम ,
संहारा शिशुपाल जिसने , तुझमे समाहित वो श्याम ,
तुझमे बसता शौर्य अभिमन्यु का , और अर्जुन का प्रतिमान , 2
हे धर्म युद्ध के सुभट योद्धा , हे भारती के अमर्त्य लाल ,
हे गंगा के अविरल प्रवाह , हे हिमालय के उन्नत भाल ,
हे विषपायी नील कंठ शंकर , हे प्रलयंकर हे महाकाल ,
अब कर ले नागों का आभूषण , श्रृंगार भस्म भी कर डाल , 3
उठा अक्षत तूणीर , उठा गांडीव कर दे अब प्रचड़ टंकार ,
उठ रणसिंघ नाद कर कर , अब भर कुपित मेघों सा हुंकार ,
हो जाय जब दरिया तूफानी तो कौन बाँध उसे रोक पाता है ?
मिटा दे सीमा रेखा को बैरी भी जाने , तुझे भूगोल बदलना आता है ! 4

