मुर्शिदाबाद में वक़्फ़ के विरोध में भीषण तांडव !राज्य सरकार की शह पर मुसलमानों द्वारा आगजनी और तोड़फोड़ !पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन ??

वक्फ बोर्ड संशोधन बिल लोक सभा और राज्य सभा में स्पष्ट बहुमत के साथ पास हुआ , राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।अधिसूचना जारी हुई नियम बन गया  . संशोधन क्या थे उनका उद्देश्य क्या था राष्ट्र हित , राष्टीर्य सम्पत्तियों का रक्षण , प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं द्वारा वक्फ की सम्पत्तियों के दुरूपयोग पर नियंत्रण गरीब और जरूरतमंद मुसलमान परिवारों को वक्फ की संपत्ति का लाभ पहुँचाना।  पहले क्या हो रहा था वक्फ बोर्ड अधिनियम की धरा 40 ने वक्फ बोर्ड को इतने अधिकार दे दिए थे कि वो देश की किसी भी संपत्ति पर अपना दावा करने और उसे पा लेने का अधिकार रखता था क्यों कि उसके दावे के विरुद्ध सुनवाई भी खुद वक्फ बोर्ड ही करता था और उसके निर्णय को किसी अदालत में चुनौती देने का प्रावधान भी नहीं था।  वक्फ बोर्ड में बैठे प्रभावशाली मुल्सिम नेता वक्फ की सम्पत्तियों को कौड़ियों के भाव में अपने ही रिश्तेदारों परिजनों और नौकर चाकरों के नाम कौड़ियों के भाव लीज में देकर उन सम्पत्तियों से करोड़ों रु कमा रहे थे और जरूरतमंद गरीब मुसलमान को कुछ भी नहीं मिल रहा था। नए कानून से सर्जरी विसंगतियां दूर हो गई प्रभावशाली बड़े मुस्लिम नेताओं पर अंकुश लग गया गरीब और जरूरतमंद मुसलमान परिवारों के लाभ का मार्ग प्रशस्त हो गया।  देश भर के आम मुसलमान ने नए नियम का स्वागत किया प्रधान मंत्री का आभार माना सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से हुआ लेकिन कुछ फिरकापरस्त और प्रभावशाली मुसलिम लीडर्स इस परिवर्तन को पचा नहीं पा रहे हैं और पूरे देश में उग्र आंदोलन और विरोध प्रदर्शन हेतु प्रयासरत हैं किन्तु कहीं कोई ख़ास सफलता नहीं मिल पा रही रहे सिवा पश्चिम बंगाल के दो दिन पहले पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद फिर  जल उठा कल रात वक्फ बोर्ड अधिनियम में संशोधन के विरोध में मुस्लिम समाज के हिंसक प्रदर्शन , आगजनी और तोड़फोड़ ने इतना उग्र रूप ले लिया कि नियंत्रित करने के लिए BSF की यूनिट को बुलाना पड़ा उन्मादी भीड़ ने  BSF की यूनिट पर लाठी डंडों और पत्थरों से हमला तो किया ही इसके बाद पेट्रोल बम भी फेंके  BSF के बहुत से जवानों को गंभीर चोटें आई हैं फिलहाल स्थिति नियंत्रण में किन्तु अत्यंत तनाव पूर्ण है।  

अब इस पूरे देश के लिए चिंतन का विषय ये है कि मुस्लिम समाज द्वारा केंद्र सरकार विरोधी उग्र और हिंसक प्रदर्शनों में पश्चिम बंगाल का मुस्लिम समाज सबसे त्वरित और मुखर क्यों होता है ?  बारीकी से अध्ययन करने पर जो मुख्य तथ्य सामने आते हैं वो इस प्रकार हैं.
 पहला तो ये कि पश्चिम बंगाल का मुस्लिम समाज कभी भी राज्य सरकार का विरोध नहीं करता वो सिर्फ ममता बैनर्जी जिसकी धूर विरोधी है उस केंद्र सरकार का ही विरोध करता है , विरोध करते समय समस्त नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अत्यंत उग्र और हिंसक प्रदर्शन करने से जरा भी नहीं डरता।  ऐसा इसलिए  कि वो
जानता है कि कानून और व्यवस्था राज्य शासन का विषय है और राज्य शासन का वरद हस्त उसके ऊपर है केंद्र सरकार के विरुद्ध किसी भी सांप्रदायिक प्रदर्शन और हिंसा के लिए राज्य शासन की तरफ से किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही न होने के प्रति वो पूर्णतः आश्वस्त है।

दूसरा तथ्य ये की इस देश में प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में  बांग्लादेशी मुसलामानों की घुसपैठ हो रही है और इन अवैध घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने के उद्देश्य से इनका आधार और वोटर कार्ड बना कर पूरा पूरा संरक्षण दे रही है ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी तृण मूल कॉन्ग्रेस ऐसी स्थिति में एक दूसरे के हितों के रक्षण के लिए घुसपैठियों और तृण मूल कॉंग्रेस की प्रतिबद्धता आवश्यकताजन्य और अति स्वाभाविक है अतः तृणमूल कॉंग्रेस द्वारा ऐसे उग्र और हिंसक प्रदर्शनों के लिए स्वपालित मुस्लिम घुसपैठियों को उकसाकर और उन पर कानूनी कार्यवाही न होने की गॉरन्टी देकर ये दंगे प्रायोजित किये जा रहे हैं।

  ये तो तय है कि स्वप्रेरित और प्रायोजित आन्दोलनों के स्वभाव में मूल अंतर होता है कोई  भी प्रायोजित आंदोलन दीर्घकालिक और फलदायी नहीं हो सकता शाहीन बाग़ , जामिया और AMU की तरह ये आंदोलन भी निष्फल होंगे लेकिन चिंतन का विषय ये है कि अपने ही लोग अपने ही देश की संपत्ति को नुक्सान पहुँचाने के लिए विदेशी घुसपैठियों की मदद ले रहे हैं और विरोध भी उन लोगों से करवा रहे हैं जिनके हित के लिए ही ये कानून बना। गरीब के हक़ के लिए बने कानून का विरोध !  सामाजिक विषय को सांप्रदायिक बनाने की साजिश ! गरीबों के हक़ के खिलाफ प्रभावशाली वर्ग की साजिश !  ऐसा लगता है 1947 में स्वतंत्रता का संग्राम समाप्त नहीं हुआ लड़ाई अभी बाकी है और हमको और आपको फिर धनुष उठाना है।

 आज दिनकर की कालजयी पंक्तियाँ फिर प्रासंगिक हो गई हैं।    

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की बेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से ?
कुंकुम लेपूं किसे ? सुनाऊँ किसको कोमल गान ?
तड़प रहा आँखों के आगे मेरा  हिन्दुस्तान।

सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में
समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा !

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अड़े हुए हैं
कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गाँधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है
समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में माताएं , वृद्ध और बाल

By editor