दुर्ग जिला अस्पताल से सामने आई एक दर्दनाक और शर्मनाक घटना ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सिकलिंग बीमारी से पीड़ित 21 वर्षीय युवती दीपिका की मौत के मामले में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं।
जानकारी के अनुसार, अस्पताल के ब्लड बैंक में ओ पॉजिटिव रक्त का करीब 85 यूनिट स्टॉक उपलब्ध था, लेकिन इसके बावजूद गंभीर हालत में भर्ती दीपिका को समय पर एक यूनिट खून तक नहीं मिल सका। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन और ब्लड बैंक के जिम्मेदार अधिकारी नियमों का हवाला देकर पीड़िता के पिता से लगातार रक्तदाता लाने की मांग करते रहे।
अपनी बेटी की जान बचाने के लिए बेबस पिता इधर-उधर डोनर तलाशते रहे, लेकिन अस्पताल प्रशासन आपातकालीन परिस्थितियों में लागू होने वाले ब्लड ट्रांसफ्यूजन प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर सका। नतीजा यह हुआ कि इलाज के इंतजार में तड़पती युवती ने दम तोड़ दिया।
घटना के बाद पूरे जिले में आक्रोश फैल गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर अभिजीत सिंह ने दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच टीम का गठन किया। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया।
रिपोर्ट में कई स्तरों पर गंभीर लापरवाही और अक्षम्य चूक पाए जाने के बाद जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज सहित 8 स्वास्थ्य कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और 48 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है।
हालांकि इस कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ब्लड बैंक की व्यवस्था और संचालन के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाने वाले ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. जे.पी. मेश्राम और विभागाध्यक्ष डॉ. देवेंद्र कुमार साहू को नोटिस की कार्रवाई से बाहर रखा गया है। ऐसे में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मामले के बड़े और प्रभावशाली चेहरों को बचाने की कोशिश की जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर दीपिका की मौत का असली जिम्मेदार कौन है? क्या जांच के बाद दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
फिलहाल पूरे जिले की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं और हर कोई यही जानना चाहता है कि क्या मृतका दीपिका को न्याय मिल पाएगा।

