देश पर आज तक का सबसे घातक आक्रमण !नहीं संभले तो बर्बादी से बचना असंभव !

आज के विश्लेषण में चर्चा करेंगे हिंदी सिनेमा , टी वी धारावाहिक और वेब सीरीज़ पर , विशेष रूप से संवादों और दृश्यों के के गिरते स्तर पर और अश्लीलता के चरम पर।  
आज चर्चा करेंगे उस समस्या पर जिसका मुँह सुरसा की तरह खुलता ही जा रहा है और पिछले सात आठ सालों में ये मुँह इतना बड़ा हो गया है कि  हमारी भाषा , संस्कृति , सामजिक शिष्टाचार और अदब को लगभग निगल चुका है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात ये है कि इस गंभीर विकृति के खिलाफ अब तक समाज के किसी भी हिस्से से कोई आवाज़ नहीं उठी है !

 हिंदी सिनेमा का शुरआती दौर धार्मिक कथाओं पर आधारित सिनेमा का था उसके बाद ऐतिहासिक पत्रों पर फ़िल्में बानी और फिर प्रेम कहानियों पर फिर सामजिक समस्यों पर उसके बाद सस्पेंस , थ्रिल , कॉमेडी आदि विषय आये इन सभी विषयों के मूल में मनोरंजन ही होता था , फिर 70 के दशक में सिनेमा के विशेष धारा को नया नाम दिया गया इसे आर्ट फिल्म क्लासिक सिनेमा कहा गया 70 और 80 के दशकों में एम एस सथ्यू , मणि कौल , श्याम बेनेगल , गोविन्द निहलानी , शशि कपूर आदि की फ़िल्में क्लासिक्स फ़िल्में कहलाईं। एमएस सथ्यू की गर्म हवा , ए एस कौल के 27 डाउन , मणि कौल की उसकी रोटी , आषाढ़ का एक दिन , दुविधा , घासीराम कोतवाल , सतह से उठता आदमी , ध्रुपद , माटी मानस , सिद्धेश्वरी , नज़र , इडियट ,द क्लाउड डोर ,नौकर की कमीज़ ,बोझ , ए मंकी’ज़ रेनकोट । श्याम बेनेगल की अंकुर , निशांत, मंथन , भूमिका , जूनून , कलयुग , आरोहण , मंडी , त्रिकाल , सुस्मन , अंतर्नाद , सूरज का सातवां घोडा, मम्मो , सरदारी बेगम , थे मेकिंग ऑफ़ महात्मा , समर , हरी भरी , ज़ुबैदा , नेताजी सुभाष चंद्र बोस , वेलकम टू सज्जनपुर , वेलडन अब्बा , मुजीब। गोविन्द नहलानी की आक्रोश , विजेता , अर्धसत्य , पार्टी , आघात , तमस , दृष्टि , पिता , रुक्मावती की हवेली , जज़ीरे , द्रोहकाल , संशोधन , हज़ार चौरासी की माँ। इन सब फिल्मों को क्लासिक फिल्म का नाम दिया गया जिसे मैं कभी स्वीकार नहीं कर सका क्योंकि यदि क्लासिक फिल्मों का निर्माण 70 के दशक में आरम्भ हुआ तो फिर 40 के दशक से बड़े फिल्मकारों ने जो कालजयी फ़िल्में बनाई हम उसे क्लासिक सिनेमा नहीं मान रहे हैं या फिर ये एक पैमाना बना लिया गया ही कि कैफ़ी आज़मी , ख्वाजा अहमद अब्बास , मणि कौल , श्याम बेनेगल , गोविन्द निहलानी , गुलज़ार जैसे वाम पंथी विचारकों की कृतियों को ही क्लासिक सिनेमा मानना है। ऐसे में मेरा प्रश्न लाज़मी है कि यदि 70 के दशक से ही क्लासिक फ़िल्में बानी तो सोहराब मोदी की की पृत्वी वल्लभ , कुंदन। वी शांताराम की , ” दो आँखें बारह हाथ ” । बिमल रॉय की दो बीघा जमीन , परिणीता , बंदिनी , सुजाता , देवदास , उसने कहा था , राजकपूर की जागते रहो , तीसरी कसम , जिस देश में गंगा बहती है , गुरुदत्त की , प्यासा , कागज़ के फूल , साहेब बीबी और गुलाम , बी आर चोपड़ा की नया दौर। देवानंद की गाइड। मेहबूब खान की मदर इंडिया। हृषिकेश मुखर्जी की सत्यकाम , आनंद , आलाप। गुलज़ार की मेरे अपने , कोशिश ,आंधी। क्या ये क्लासिक फ़िल्में नहीं थी ?

दरअसल नरेटिव सेट करने में वामपंथियों का कोई मुक़ाबला ही नहीं हो सकता 60 और 70 के दशक में हिंदी सिनेमा में वामपंथियों का प्रभाव बढ़ा और उनका एक रैकेट बना , अपने ही काम का महिमामंडन और आत्मस्तुति में पारंगत इस समूह ने एक बौद्धिक जेहाद छेड़ा और तथा कथित क्लासिक सिनेमा या आर्ट फिल्मों के नाम पर अश्लीलता अंग प्रदर्शन के अलावा गरीबी , भुखमरी , शोषण , सामाजिक विद्वेष और निरंकुश सत्ता वाले देश की छवि अंतर्राष्ट्रीय जगत में परोसी गई। यथार्थ , कला और सत्य के नाम पर दृश्यों और संवादों में मर्यादा का उल्लंघन , फूहड़ता , नग्नता को समाज में मान्यता दिलवाने के कुत्सित प्रयास प्रारम्भ हुए और 70 के दशक में बोया गया ये बीज आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है अब इस वृक्ष में घटिया दृश्य और संवाद वाली फ़िल्में भी हैं , टी वी सिलियल्स भी हैं और समाज के लिए सबसे घातक तो वेब सीरीज़ हैं। दृष्यों में अश्लीलता और नग्नता के साथ संवांदों में अश्लील अपशब्दों और गन्दी गलियों के खुले प्रयोग से समाज विस्मित है अवाक् है हतप्रभ है किन्तु मौन है।
सिनेमा के लिए तो सेंसर बोर्ड है अश्लील दृश्यों , संवादों और हिंसा दिखने वाली फिल्मों को A सर्टिफिकेट दे कर ऐसी फिल्मों को देखने के लिए अट्ठारह वर्ष से काम आयु के बच्चों का प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है किन्तु OTT प्लेट फॉर्म पर यही फ़िल्में और अश्लील वेब सीरीज़ घर में रखे टी वी के माध्यम से चौबीसों घंटे अबोध बच्चों के सीधी पहुंच में हैं और बच्चे इन्हे माँ बाप की अनुपस्थिति में कभी भी देख सकते हैं और देख रहे हैं। वेब सीरीज़ में दिखाए जा रहे अश्लील , कामुक और हिंसक दृश्य , मां बहन के गलियां और अश्लील संवादों का छोटे छोटे अबोध बच्चों के कोमल मनोमस्तिष्क पर पड़ने वाला असर इस देश की तरुणाई को जिस गर्त की और ले जा रहा है क्या इसका भान हमारे समाज के ठेकेदारों को जरा भी नहीं है ?

 वेब सीरीज़ के माध्यम से अपराधियों का महिमा मण्डन और समाज में कामुकता , हिंसा , संस्कारहीनता का रोपण , भारतीय संस्कृति को समूल नष्ट करने के वामपंथी और अंतराष्ट्रीय षड्यंत्र का एक महति प्रकल्प है । और यदि हम आज नहीं संभले तो भविष्य में हमारे घरों में मुंशी प्रेम चंद , दिनकर , पंत ,प्रसाद ,निराला , वीर सावरकर और अब्दुल हामिद नहीं बल्कि मुन्ना त्रिपाठी और गुड्डू पंडित ही पैदा होंगे फिर कर लेना पाकिस्तान और बांग्ला देश से जंग ।

अब प्रश्न ये उठता है कि समाज का कौन सा हिस्सा मुखर हो , मीडिया ? समाज सेवी संस्थाएं ? कथावाचक, धर्मगुरु ? राजनीती ? साहित्य ? न्याय पालिका ? हर चूहे का प्रश्न है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? कैसी विचित्र विडंबना है किसी एक फिल्म में किसी जाति विशेष पर एक टिपण्णी के विरोध में उस जाति के लोग आंदोलित हो उठते हैं थियेटर से लेकर सड़क तक प्रदर्शन तोड़ फोड़ हिंसा आगजनी सबकुछ कर डालते हैं और जब पिछले कुछ सालों से लगभग सभी फिल्मों और खासकर वेब सीरीज़ में मर्यादाओं के सारे बांध टूट चुके हैं दृश्यों और संवादों में असभ्यता और अश्लीलता अपने चरम पर है सम्प्रेषण के सबसे सशक्त माध्यम जो समाज को सबसे तीव्रता से प्रभावित करता है वो पूर्णतः निरंकुश होकर हमारी संस्कृति को भेद रहा है छेद रहा है तार तार कर रहा है और हम सब तमाशबीन बनकर खड़े हैं।
और सबसे ज्यादा विस्मय इस बात का है कि इस कुव्यवस्था को नियंत्रित करने के सारे अधिकार केंद्र सरकार के पास हैं वर्तमान जिस पार्टी की केंद्र में सरकार है वो इस देश में धर्म और संस्कृति की सबसे बड़ी रक्षक कहलाती है पिछले ग्यारह सालों  से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और इस अश्लीलता की मूक दर्शक बनी बैठी है
। और फिर भारतीय जनता पार्टी को भारतीय संस्कृति से विमुख न होने देने के लिए समय समय पर गाइड लाइन जारी करने वाला आर एस एस भी इस गंभीर समस्या से बेपरवाह है ! आज से कुछ वर्ष पहले भारत में गूगल पर पोर्न साइट्स सहज उपलब्ध होतीं थी किन्तु भारत सरकार ने उन पर अंकुश लगा दिया और अब वे उपलब्ध नहीं हैं जब एक अंरराष्ट्रीय साईट को आप नियंत्रित कर सकते हैं तो भारत में बनने वाले वेब सीरीज़ आपके नियंत्रण से बहार कैसे हैं ? लेकिन ये प्रश्न कोई भी नहीं कर रहा है  

 1 सत्ता की हर छोटी से छोटी चूक पर मुखर होकर बोलने वाला मीडिया कहाँ है ?
2 सत्ता की हर छोटी से छोटी चूक पर संसद से लेकर सड़क तक हंगामा करने वाला विपक्ष कहाँ है ?
3 बलात्कार पर पूरे देश में कैंडल मार्च निकलने वाली समाज सेवी संस्थाएं कहाँ हैं ?
4 समाज के हर कुव्यवस्था पर स्याही खर्चने वाला लेखक , कवी , साहित्यकार कहाँ है ?
5 धार्मिक साम्प्रदायिक राजनैतिक विषयों पर तत्काल संज्ञान लेने वाली न्याय पालिका कहाँ है ?
6 धर्म जागरण केलिए सदैव तत्पर धर्म संस्कृति के रक्षक सारे कथावाचक धर्मगुरु कहाँ हैं ?
7 शिक्षक चिकित्सक वकील कहाँ है ?
8 सेंसर बोर्ड कहाँ है ?
क्या इन सभी के मौन का मतलब ये है की पूरे समाज ने पर्दे पर परोसी जा रही अश्लीलता का मान्यता दे दी है क्या वेब सीरीज़ में सुनाई देने वाली अभद्र भाषा और गालियां अब हमारे और आपके भी संवादों में जगह बना लेंगे ? अगर ये सच है तो हमारी संस्कृति का पतन तय है और यदि इस अश्लीलता को समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिली है तो कहीं न कहीं से इसके खिलाफ आवाज़ उठना अनिवार्य है। यदि आपको ऐसा लगता है ये विषय सुप्रीम कोर्ट में पी आई एल लगाने लायक है तो नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट आवश्य करें !

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By editor