40 से 70 तक के दशकों की अधिकतर हिंदी फिल्मों के ग्रामीण परिवेश में मुख्य खलनायक गाँव का सूदखोर महाजन होता था और ये फ़िल्मी कहानी मात्र नहीं थी सचमुच ग्रामीण क्षेत्रों में सूदखोरी के दम पर ही न जाने कितने लोग सैकड़ों एकड़ जमीन के मालिक बन गए और न जाने कितने भूमिहीन हो गए ! यदि छत्तीसगढ़ की बात करें तो सन 2000 में नया राज्य बनने के बाद जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और सहकारी समितियों से किसानों को जो ऋण सुविधाएं सुलभ हुई उसके बाद ग्रामीण अंचल में व्यवस्थाएं काफी बदली , किसान संपन्न हुए और सूदखोरी के चंगुल से मुक्त भी हुए लेकिन समाज से सूदखोरी का अभिशाप ख़त्म नहीं हुआ सूदखोरी की ये ग्रामीण व्यवस्था अब गावों से निकल कर शहरों में अपने पैर प्रसार चुकी है। हाल ही में रायपुर पुलिस ने सूदखोरों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई कर रायपुर के कुख्यात सूदखोर तोमर बंधुओं को घेरे में लिया ये सचमुच बड़े आश्चर्य का विषय है कि कुछ वर्ष पहले अंडे का ठेला लगाने वाले दोनों भाई आज करोड़ों में खेल रहे हैं। वीरेंद्र सिंह तोमर और रोहित सिंह तोमर शहर से फरार हैं, दोनों की अब तक गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। दूसरी ओर उसके गुर्गों का आतंक कम नहीं हुआ है। एक महिला यूट्यूबर को बम से उड़ाने की धमकी दी है। दैनिक समाचार पात्र पत्रिका के पोर्टल में दिनांक 17 -06 – 2025 की खबर के अनुसार पीडि़ता ने इसकी शिकायत डीडी नगर थाने में की। पुलिस ने अपराध दर्ज कर विवेचना में लिया है। वास्तविक में रायपुर पुलिस की कार्यवाही सूदखोरी के अवैध कारोबार का एक प्रतिशत हिस्से पर भी नहीं हुई है , आज की तारीख में रायपुर , दुर्ग , भिलाई में ही सूदखोरी का अवैध कारोबार सैकड़ों करोड़ रु प्रतिमाह का है।
आइये समझते हैं ये अपराध शहरों में कैसे संचालित होते हैं दरअसल ये सूदखोर पूरे देश में एक सामानांतर अर्थ व्यवस्था चला रहे हैं जिससे कला धन तूफानी गति से बढ़ रहा है आप समझने की कोशिश करें ब्याज पर चलने वाला पैसा नगद यानि की अन
एकॉउंटेड पैसा होता है जो निश्चित रूप से काला धन है और इन सूदखोरों की ब्याज दरें भी ऐसी होती हैं कि आम आदमी इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता । क्या आप सोच सकते हैं कि ये सूदखोर 5 % महीने से ले कर 10 % प्रतिमाह तक की ब्याज दर पर पैसा चला कर कहते गरीब व्यापारियों का भरपूर शोषण कर रहे हैं। इतना ही नहीं वसूली के लिए गुंडे भी पाल रहें और शहर में अपराध को बढ़ावा भी दे रहे हैं।
भिलाई शहर में सूदखोरों का बड़ा नेटवर्क सक्रीय है इस कारोबार में व्यापारी , नेता , बी एस पी कर्मचारी , सहकारी साख समितियों के पदाधिकारी और कर्मचारी और अन्य कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं इस विषय पर हमारे रिपोर्टर ने कुछ खुदरा व्यापारियों से बात की देखिये आर सी एन रिपोर्टर संजय दुबे की एक रिपोर्ट।
तो देखा आपने किस तरह ये सूदखोर सामान्यतः 5 % मासिक से लेकर 10 % मासिक की ब्याज दर पर ऋण देते हैं फल और सब्जी के फुटकर व्यापारी जिन्हे खरीदी के लिए प्रतिदिन पैसों की आवश्यकता होती है ऐसे व्यापारी 10 % प्रतिमाह की ब्याज दर पर क़र्ज़ लेते हैं। जैसा कि इन व्यापारियों ने बताया कि की जब ये तीन महीने के लिए दस हज़ार रु लेते हैं तो इन्हे तीन महीनों में बारह हज़ार रू लौटने होते हैं लेकिन सूदखोर इन्हे पहले महीने का ब्याज एक हज़ार रु काट कर सिर्फ नौ हज़ार रु देता है अब उस सूदखोर की लगत होती है नौ हज़ार और उसपर ब्याज मिलता है तीन हज़ार जो हुआ तीन महीने का 33 % अर्थात 11 % प्रतिमाह अब आप ही सोचिये जहाँ बैंकों में आपका पैसा 10 साल में दोगुना होता है वहां इन सूदखोरी के धंधे में पैसा नौ महीनों में ही दोगुना हो जा रहा है। लोन देने के सख्त प्रावधानों और जटिल प्रक्रियाओं के बाद भी बैंक में प्रतिवर्ष हज़ारों खाते एन पी ए हो रहे हैं बैंक के करोड़ों रु डूब रहे हैं लेकिन सिर्फ आधार कार्ड रख कर बिना किसी लिखा पढ़ी के बड़ी ही सरलता से उपलब्ध इन सूदखोरों का पैसा बहुत कम डूबता है क्योंकि ये हर हाल में अपना पैसा वसूलना जानते हैं , एक तो सूदखोरी के धंधे में संलिप्त अधिकतर लोग रसूखदार और बाहुबली किस्म के हैं इसके अलावा वसूली के लिए ये लोग गुंडे बदमाशों का उपयोग भी करते हैं इस धंधे में जहाँ देखते ही देखते ब्याज की रकम मूलधन से कई गुना अधिक हो जाती है और इसकी वसूली के लिए सूदखोर खुले आम गुंडागर्दी करते हैं लाचार और निरीह कर्ज़दार के पास कोई सहारा नहीं होता पुलिस के पास जाने पर इसे पुलिस हस्तक्षेप अयोग्य अपराध बता कर प्रार्थी को कोर्ट जाने की सलाह दी जाती है , कोर्ट में देर सबीर न्याय तो मिल सकता है लेकिन गरीब को सूदखोरों के गुंडों या गुंडागर्दी से सुरक्षा नहीं मिल सकती अतः वो क़र्ज़ चुकाने के लिए अपना सब कुछ बेचने तक को मजबूर होता है । बैंकों के पहाड़ जैसे नियमों से त्रस्त छोटे छोटे व्यापारियों या प्राइवेट नौकरी करने वाले लोगों की पैसों की आवश्यकता और मजबूरी ही इस पूरे गोरख घंधे का मूल आधार है इसलिए पुलिस इस बड़े समुन्दर से तोमर बंधू जैसी एक्का दुक्का मछलियों को पकड़ती रहेगी लेकिन इस कारोबार को तब तक ख़त्म नहीं कर सकती जब तक शहरी बैंकों में भी लोन की प्रक्रिया सरल नहीं हो जाती।
सूदखोरी को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने बाकायदा अधिनियम बना रखा है और जोकि हर प्रदेश में अलग अलग लागू है छत्तीसगढ़ में भी साहूकार अधिनियम 1934 प्रभावशाली है जो 1 नवम्बर 2000 से पूरे प्रदेश में लागू है। इस नियम के तहत सरकार द्वारा साहूकारी का लाइसेंस जारी किया जाता है और साहूकार के लिए न्यूनतम ब्याज दर निर्धारित है और ऋण देने से लेकर रजिस्टर मैनें करने तक के ढेर सरे नियम हैं। लेकिन आज बाजार में सुद्खरी का धंधा करने वाले रसूखदारों में से कितनों के पास लाइसेंस है और कितने गैर लाइसेंसी हैं और जिनके पास लाइसेंस है वो नियमों का खासकर ब्याज की दरों के नियमों का कितना पालन कर रहे हैं ये जांच का विषय है साथ ही साथ प्रश्न है कि जाँच करेगा कौन ?
आर सी एन की टीम इस विषय पर निरंतर शोध कर रही है अगली कड़ी में आपको बताएंगे शहर के कुछ बड़े रसूखदार सूदखोरों की कहानी

