नवरात्र में बंगाल में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। षष्ठी से आरम्भ होकर विजयादशमी तक चलने वाले इस उत्सव में सिंदूर खेला एक महत्वपूर्ण रस्म है। इस दौरान बंगाली महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं। यह रस्म मां दुर्गा की विदाई का प्रतीक माना जाता है। बंगाली समाज में दुर्गा पूजा की शुरुआत षष्ठी यानी नवरात्र के छठवें दिन से होती है और विजयादशमी के साथ इस पर्व का समापन किया जाता है। यहां दशहरे को विजयादशमी के रूप में मनाते हैं और इस दौरान सिंदूर खेला का आयोजन किया जाता है। यह बंगाल और यहां की संस्कृति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा है, जो अपने आप में बेहद खास है सिंदूर खेला की रस्म में बंगाली समुदाय की महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाती हैं। साथ ही पंडाल में मौजूद लोग एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर दुर्गा पूजा और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हैं। और धूमधाम से दुर्गा पूजा का समापन किया जाता है। बंगाल में ऐसा माना जाता है कि नवरात्र के दौरान माता पानी नौ दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। इसी उपलक्ष्य में बड़े-बड़े पंडालों में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है। षष्ठी से शुरू होने वाली दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है और अंत में विजयादशमी के मौके पर सिंदूर खेला यानी सिंदूर की होली खेलकर बेटी स्वरूप मां दुर्गा को विदा किया जाता है यानी कि मां दुर्गा की विदाई के मौके पर यह रस्म मनाई जाती है। यह पूरी रस्म स्मृति नगर स्थित कालीबाड़ी में बंगाली समाज की महिलाओं द्वारा पूरे रीति रिवाज से पूर्ण की गई इस मौके पर महिलाओं ने ढाकी की ढाक पर खुशियां मनाते हुए मां दुर्गा के प्रतिमा के समक्ष नृत्य किया एवं महिलाओं ने इस रस्म के बारे में न्यूज़ टीम को जानकारी दी साथ ही कालीबाड़ी पूजा उत्सव समिति के सदस्यों ने भी कार्यक्रम की जानकारी उपलब्ध कराइ है यह रस्म मुख्य रूप से बंगाली हिंदू महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। परंपरा के मुताबिक विवाहित महिलाएं इस पर्व में हिस्सा लेती हैं और पूरे रीति-रिवाज के साथ इस रस्म को पूरा करती हैं। ऐसा माना जाता है कि यह रस्म विवाहित महिलाओं के लिए सौभाग्य लाती है और उनके पति की उम्र लंबी होती है। यही वजह है कि सिंदूर खेला शादीशुदा महिलाओं के लिए बेहद खास होता है और इसलिए वह साल भर इसका इंतजार करती हैं।।

