सिस्टम की बेरुखी, लाचार पिता की चीख!

ठीक एक महीने पहले, 1 मई को पूरे देश ने मजदूर दिवस मनाया था। मजदूरों के सम्मान और उनके अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं। लेकिन 1 जून को दुर्ग से आई एक खबर ने उन सभी दावों पर सवाल खड़े कर दिए।

दुर्ग जिला अस्पताल में सिकलिंग बीमारी से पीड़ित 22 वर्षीय दीपिका की दर्दनाक मौत हो गई। दीपिका एक मजदूर की बेटी थी, जिसे इलाज के दौरान खून की सख्त जरूरत थी। परिजन लगातार 48 घंटे तक अस्पताल और ब्लड बैंक के चक्कर लगाते रहे, लेकिन समय पर खून नहीं मिल सका।

परिवार की बेबसी और सिस्टम की लापरवाही के बीच दीपिका जिंदगी की जंग हार गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अस्पताल के सिविल सर्जन ने भी स्वीकार किया कि यदि समय पर खून उपलब्ध हो जाता, तो शायद दीपिका की जान बचाई जा सकती थी।

एक तरफ मजदूरों के सम्मान की बातें होती हैं, दूसरी तरफ एक मजदूर पिता अपनी बेटी को बचाने के लिए सिस्टम के सामने हाथ जोड़ता रह जाता है। अब सवाल यह है कि आखिर एक बोतल खून की कीमत एक बेटी की जिंदगी से बड़ी कैसे हो गई?

By editor