आज दिनांक 30 मार्च सन 2025 चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा, विक्रम संवत 2082, हिन्दू नव वर्ष के अवसर पर सभी दर्शकों को राष्ट्रिय चेतना न्यूज़ की तरफ से हार्दिक शुभकामनायें।
आज की चर्चा का विषय है नव वर्ष के अवसर पर शक्ति की साधना की महत्ता।
शक्ति की महत्ता जिस संस्कृति के मूल में है उसी संस्कृति का मत है कि व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है अतः जब व्यक्ति शक्तिशाली होगा तब समाज शक्तिशाली होगा और जब समाज शक्तिशाली होगा तब राष्ट्र शक्तिशाली होगा तो एक शक्तिशाली राष्ट्र के निर्माण के लिए राष्ट्र की मूल इकाई अर्थात प्रत्येक व्यक्ति का शक्तिशाली होना अनिवार्य है और इसीलिए हमारी संस्कृति में नव वर्ष का प्रारम्भ शक्ति की साधना से होता है। वैसे तो शक्ति के संकलन की होड़ पूरे संसार में आदि काल से चली आ रही है किन्तु उनके और हमारे ध्येय में मूल अंतर उद्देश्य का है ! जहाँ संसार के अधिकांश देशों में शक्ति संकलन का मूल उद्देश्य विस्तारवाद और वर्चस्व प्राप्ति रहा है वहीँ हमारे शक्ति संकलन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धर्म रक्षण ही रहा है। रामायण और महाभारत दोनों ही ग्रंथों में भगवन श्री राम और अर्जुन के द्वारा विजय प्राप्ति के लिए शक्ति की उपासना का उल्लेख है और ये दोनों ही युद्ध अधर्म पर धर्म की विजय के लिए ही हुए थे और यही हमारी धार्मिक , आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है ।
लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारी ही सरकार हमारी ही संस्कृति और संस्कृति जनित संस्कारों से दूर होती चली गई और सबल – शक्तिशाली नागरिक का निर्माण न कर अहिंसा और शांति के नाम पर अहिंसा परमो धर्मः जैसे अधूरे विमर्श जनता के सामने रखे जिसके परिणामस्वरुप हमने 1947 में एक तिहाई कश्मीर खोया , 1962 में चीन से युद्ध हारे और 1971के युद्ध में पकिस्तान के 90000 सैनिकों के समर्पण के बाद भी पकिस्तान से अपना एक तिहाई कश्मीर वापस न ले सके । धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के हमारे अधिकार और दायित्व से हमें विमुख कर शांति के नाम पर भीरु हो जाने का मन्त्र देने वालों का अपराध अक्षम्य तो है ही साथ ही साथ अपने भीरूपन से राष्ट्र की अस्मिता का क्षय करने वालों का नाम इस देश में चिर काल तक काली स्याही से लिखा जाना तय है। 1962 के भारत चीन युद्ध के समय राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने भरी संसद नेहरू की शांति नीति का विरोध करते हुए कहा था ,
रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिर हमें गाण्डीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे,
‘हर-हर-बम’ का फिर महोच्चार।
अहिंसा परमो धर्मः का अर्थ है अहिंसा पराम् धर्म है किन्तु ये अधूरी उक्ति है , पूर्ण उक्ति है ….
अहिंसा परमो धर्मः ! धर्म हिंसा तथैव च: !
अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है। अर्थात धर्म के रक्षण के लिए किया जाने वाला युद्ध भी धर्म ही है इसी लिए महाभारत में रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है। जिसमें धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं ,
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥’
हमारी संस्कृति में धर्म के लिए युद्ध , युद्ध का धर्म और युद्ध में धर्म ! बड़े ही स्पष्ट हैं हमने धर्म पालन के लिए युद्ध किया और युद्ध में भी धर्म का पालन किया। महाभारत के युद्ध का एक दृष्टान्त रखता हूँ। कर्ण और अर्जुन के अंतिम और निर्णायक युद्ध के दौरान एक भयंकर विषधर सर्प कर्ण के पास आया और बोलै मुझे अपने वाण के साथअर्जुन तक पहुंचा दो मैं उसे ऐसा डसूंगा की तीनो लोक में कोई उसके प्राण रक्षण न कर सकेगा।इस प्रसंग का हिंदी में सर्वश्रेष्ठ वर्णन दिनकर ने कुछ इस प्रकार किया है ,
गत्वर, गैरेय,सुघर भूधर से, लिए रक्त-रंजित शरीर,
थे जूझ रहे कौंतेय-कर्ण, क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर।
दोनों रण-कुशल धनुर्धर नर, दोनों सम बल, दोनों समर्थ,
दोनों पर दोनों की अमोघ, थी विशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ।
इतने में शर के लिए कर्ण ने, देखा ज्यों अपना निषंग,
तरकस में से फुंकार उठा, कोई प्रचंड विषधर भुजंग।
कहता कि कर्ण ! मैं अश्वसेन, विश्रुत भुजंगों का स्वामी हूँ,
जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूँ।
बस एक बार कर कृपा धनुष पर, चढ़ शख्य तक जाने दे,
इस महाशत्रु को अभी तुरत, स्पंदन में मुझे सुलाने दे।
कर वमन गरल जीवन-भर का, संचित प्रतिशोध, उतारूँगा,
तू मुझे सहारा दे, बढ़कर, मैं अभी पार्थ को मारूँगा।
राधेय ज़रा हँसकर बोला, रे कुटिल ! बात क्या कहता है?
जय का समस्त साधन नर का, अपनी बाहों में रहता है।
उसपर भी साँपों से मिलकर मैं मनुज, मनुज से युद्ध करूँ?
जीवन-भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुद्ध करूँ?
तेरी सहायता से जय तो, मैं अनायास पा जाऊँगा,
आनेवाली मानवता को, लेकिन क्या मुख दिखलाऊँगा?
संसार कहेगा, जीवन का, सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया,
प्रतिभट के वध के लिए, सर्प का पापी ने साहाय्य लिया।
रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी,
सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुरग्राम-घरों में भी।
ये नर-भुजंग मानवता का, पथ कठिन बहुत कर देते हैं,
प्रतिबल के वध के लिए नीच, साहाय्य सर्प का लेते हैं।
ऐसा न हो कि इन साँपों में, मेरा भी उज्ज्वल नाम चढ़े,
पाकर मेरा आदर्श और कुछ, नरता का यह पाप बढ़े।
अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है,
संघर्ष, सनातन नहीं, शत्रुता, इस जीवन-भर ही तो है।
अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषांध बिगाड़ूँ मैं,
साँपों की जाकर शरण, सर्प बन, क्यों मनुष्य को मारूँ मैं?
जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता,
मैं किसी हेतु भी यह कलंक, अपने पर नहीं लगा सकता।
ये जो कर्ण का जो उत्तर था वही धर्म का युद्ध है वही युद्ध का धर्म है और वही हमारी सांस्कृतिक विरासत है। अतः आइये हम सब मिलकर नव वर्ष का आरम्भ शक्ति की साधना से कर शक्तिशाली समाज और शक्तिशाली राष्ट्र के निर्माण का मार्ग प्रशांत करें।
जय मां भारती !

