पिछले 10 सालों में भारत में शादी के तौर तरीकों में आशातीत परिवर्तन आये हैं खासकर उच्च और माध्यम वर्ग की  हिन्दू शादियों में वो भी मध्य भारत तथा  उत्तर भारत में विवाह एक संस्कार की जगह एक इवेंट मात्र हो गया है , निश्चित रूप से विवाह दो परिवारों के मिलन का अवसर होता है जिसमें हर्ष उल्लास और उत्सव का समाहित होना स्वाभाविक है यहाँ देखने वाली बात ये है कि विवाह में हर्ष उल्लास और उत्सव तो आज से दस साल पहले भी होता था लेकिन वैवाहिक संस्कार इससे बिलकुल भी प्रभावित नहीं होते थे किन्तु आज संस्कार आयोजन के आडम्बर तले पूरी तरह दब  कर रह गए हैं अब तो हिन्दुओं में वैवाहिक संस्कार भी टुकड़ों में होने लगे हैं हाल ही में कई ऐसी शादियों में शरीक हुआ जिसमें मुहूर्त के चलते सिर्फ पाणी ग्रहण संस्कार दोपहर को हो गया और फिर शाम को बैंड बाजे के साथ बारात निकली द्वारचार हुआ बारात स्वागत हुआ और रिसेप्शन हुआ और फिर आधी रात फेरे हुए ऐसे में ये सहज प्रश्न उठता है कि जब मुहूर्त दोपहर का था तो सारी रस्में दोपहर को ही क्यों नहीं कार दी गई ? तो जवाब मिलता है कि सारी व्यवस्था इवेंट मैनेजमेंट फर्म के हाथ में थी बैंड पार्टी डी जे वालों के साथ लाइट वाले भी बुक होते हैं इसलिए बारात दिन में निकालना संभव नहीं था , दिन की गर्मी में बरातियों को नाचने में भी असुविधा होती है।बहरहाल अब कहानी आगे बढ़ती है बारात स्वागत के बाद दूल्हे को मंच में ले जाया जाता है जहाँ जयमाल की रस्म होनी है दूल्हे के मंच में स्थापित होने के बाद विचित्र वेशभूषा में विचित्र नृत्य करता हुआ युवक युवतियों का एक समूह दुल्हन को मंच पर लेकर आता है , दुल्हन के मंच पर पंहुचते ही इवेंट कंपनी का एक बेसुरा सा एंकर और अत्याधुनिक पाश्चात्य पोषक वाली को एंकर मंच मंच पर मौजूद दूल्हे के माता पिता रिश्तेदारों को मंच से नीचे उतार देते हैं , क्यों ?      इसलिए की जयमाल के समय दूल्हा दुल्हन को प्रिवेसी चाहिए !अरे नामुरादों इतनी ही प्रिवेसी चाहिए थी तो घने जंगलों के किसी मंदिर में गंधर्व विवाह कर लेते।  मतलब क्या है   ? जयमाल के समय मंच पर यदि दूल्हा दुल्हन के माता पिता होंगे तो आशीर्वाद ही तो देंगे लेकिन नहीं इवेंट वालों का मांनना है ये सब दकियानूसी रूढ़ियाँ हैं जो अब की मॉर्डन जेनेरशन नहीं झेल सकती।     भारतीय सनातन संस्कृति ही ऐसी संस्कृति है जिसमें श्रेष्ठ जीवन के संपादन हेतु सोलह संस्कारों की व्यवस्था दी गई है इन संस्कारों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है पाणिग्रहण संस्कार जिसे हम विवाह संस्कार भी कहते है सबसे पहले तो पाणिग्रहण के शाब्दिक अर्थ को समझें पाणि का अर्थ होता है हाथ और ग्रहण का अर्थ होता है पकड़ना या लेना पाणिग्रहण अर्थात हाथ को लेना इस संस्कार में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि की साक्षी में वर कन्या के हाथ का अपने हाथ में लेता है और वर वधु जन्म जन्मांतर के लिए एक दुसरे के हो जाते हैं इस तरह ये प्रमाणित तथ्य है कि सनातन में विवाह जन्मजन्मांतर का साथ है और इसके टूटने का कोई प्रावधान सनातन में नहीं है इसी लिए हमारी शब्दावली में तलाक़ का कोई पर्यायवाची शब्द ही नहीं है। जबकि अन्य संस्कृतियों में विवाह वर और वधु के बीच अनुबंध है जिसे कोई भी एक जब चाहे  तोड़ सकता है।  हमारी संस्कृति और संस्कृति जनित संस्कार अनादि हैं और हमारे समाज ने इसे अब तक संजो कर रखा भी है किन्तु बदलती परिस्थितियों में निश्चित रूप से हमारी संस्कृति खतरे में है। समाज के लिए इसके कारणों और निवारण के उपायों पर गहन मंथन और प्रवर्तन अनिवार्य है।     हम सब जानते हैं कि 1192 से लेकर 1947 तक भारत 755 वर्ष गुलाम रहा 755 वर्षों  की गुलामी में भारतियों की धन , संपत्ति , वैभव को विदेशियों ने लूटा लेकिन इन 755 सालों  में वे हमारी संस्कृति को मिटा न सके और हमारी संस्कृति ही हमारी वो ताक़त थी जिसने लम्बे संघर्ष के बाद हमें स्वाधीनता दिलाई। आज हमारे समाज के लिए चिंतन का विषय है कि 755 वर्षों की दासता जिस संस्कृति को रंच भर नुक्सान न पहुंचा सकी पिछले तीस सालों में 32 इंच का डिब्बा उस संस्कृति को तार तार करने में कामयाब हो गया है !  जी हाँ 32 इंच का ये डब्बा जैसी आप टी वी कहते हो बारहों महीने और चौबीसों घंटे वाहियात सीरियलों और फिल्मों के माध्यम से हमारे समाज पर निरंतर सांस्कृतिक आक्रमण कर रहा है और , हमारी संस्कृति का सत्यानाश हो रहा है और हम स्वयं इसके हथियार बन कर अपनी संस्कृति को मिटने पे आमादा हैं।  हर टी वी धारावाहिक में दिखया जा रहा है कि कोई लड़की किसी एक लड़के के लिए नहीं है कोई लड़का किसी एक लड़की के लिए नहीं है।  आज विवाह हो रहा रही कल तलाक हो रहा है परसों फिर विवाह हो रहा है अधेड़ उम्र के स्त्री पुरुष तलाक दे रहे हैं फिर विवाह कर रहे हैं , विवाह के बाद पति पत्नी की हत्या कर दे रहा है , पत्नी पति की हत्या करवा दे रही है।  इन सब घटनाओं को इतने सामान्य रूप में दिखाया जा रहा है कि नै पीढ़ी इसे हमारी सामजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर रही है।    इसमें दोष इस नई पीढ़ी का नहीं है दोष हमारा है हम नई पीढ़ी का परिचय हमारी  संस्कृति और संस्कारों से नहीं करवा रहे हैं।  नई पीढ़ी क्या पढ़ रही है क्या सीख रही है हम इससे पूरी तरह से बेपरवाह हैं हमारे अनमोल ग्रथ जो संस्कारों का अकूत भंडार हैं हम अपनी नई पीढ़ी को उन ग्रंथों का न तो पढ़ा रहे हैं न सुना रहे हैं।  रामायण , महाभारत , गीता और पुराण संस्कारों के बीज बोते हैं हैं किन्तु नई पीढ़ी उनसे कोसों दूर है।  रामायण महाभारत में परिवार की महत्ता और परिवार के लिए त्याग के दृष्टान्त भरे पड़े हैं। राम और कृष्ण आदर्शों और मर्यादाओं की महत्ता के जीवंत उदाहरण हैं लेकिन नै पीढ़ी से बहुत दूर हैं।  पिता की आज्ञा पालन हेतु राज पाट का त्याग कर वर्षों तक वन में भटकने वाले राम , स्त्री के सम्मान के लिए त्रिलोक विजयी सत्ता को चुनौती देकर उसे परास्त करने वाले राम प्रजा के सम्मान में स्त्री का त्याग करने वाले राम से तो तो नई पीढ़ी परिचित ही नहीं है।  भविष्य में ऐसी घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए पहली आवश्यकता है नई  पीढ़ी में पुराने संस्कारों के रोपण की।  आइये आज हम सब शपथ लें कि इन वाहियात धारावाहिकों का एक मत होकर बहिष्कार करेंगे और नई पीढ़ी में मर्यादा पुरषोत्तम राम और नीति निपुण कृष्ण के संस्कारों के रोपण की दिशा में हर संभव कदम उठाएंगे। ऐसा करके ही हम अपनी संस्कृति और संस्कृति जनित संस्कारों का रक्षण कर सकते हैं और अपने समाज को मर्यादित तथा संस्कारित समाज के रूप में स्थापित कर सकते हैं।   आज के लिए इतना ही कल फिर एक नए विषय पर चर्चा करेंगे।  उत्तिष्ठ भारतः   

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