उत्तिष्ठ भारतः मैं राजीव चौबे और आप देख रहे हैं राष्ट्रीय चेतना न्यूज़ आज के विश्लेषण का विषय है हिन्दू समाज में वर्ण व्यवस्था का आधार और औचित्य 
पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर श्री रामभद्राचार्य  एक बयान जबरदस्त रूप से वाइरल हुआ है जिसमे रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज के विषय में कहा की वे ना तो संस्कृत जानते हैं ना ही वो विद्वान् हैं। इस विवादित बयान के बाद शंकराचार्य श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी सहित कई धर्माचार्यों ने इस बयान का विरोध भी किया है।  किन्तु यहाँ आश्चर्य की बात ये है कि रामभद्राचार्य के इस बयान से पहले एक और विवादित बयान आया था जो  वास्तव में इस बयान से भी अधिक विवादास्पद था उस बयान में रामभद्राचार्य ने कहा की मनुष्य कर्म से नहीं जन्म से ब्राह्मण होता है।  निश्चित रूप से रामभद्राचार्य के इन बयानों में उनका अहंकार झलक रहा है वेद उपनिषद और पुराण पढ़ कर ज्ञानी होने का अहंकार पालने वालों के को सबसे पहले निरक्षर कबीर ने जमीन दिखते हुए कहा था पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

तो आइये आज इसी विषय पर चर्चा करते हैं की ब्राह्मण कौन है या ब्राह्मण कौन हो सकता है ? 

सर्वप्रथम तो हमे यह जानना अनिवार्य होगा कि वर्ण व्यवस्था के प्रारंभिक दौर से ही ब्राह्मणों को समाज में जो सर्वोच्च  स्थान प्राप्त हुआ उसका कारण क्या था. इसमें दो अहम प्रश्न आते हैं पहला  –  क्या ब्राम्हण की प्रतिष्ठा उसके जन्म पर आधारित थी ? दूसरा – क्या किसी कुल विशेष में जन्म लेने मात्र से ही जातक विप्र हो जाता है ?

इन दोनों प्रश्नों का उत्तर यस्क मुनि ने सहस्त्रों  वर्ष पूर्व दे रखा है, यस्क मुनि के अनुसार

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः ।
वेद पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्मा जानातीति ब्राह्मणः ।।

अर्थात- व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ग्रह्मा को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।

तब अगला अहम प्रश्न आता है कि आदि काल से भारतीय समाज में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा का आधार क्या था ? वर्ण व्यवस्था के आरंभिक काल के अध्ययन से हम पाते हैं कि उस समय वर्णों का निर्धारण जन्म पर आधारित न हो कर कर्म पर आधारित था । ब्राह्मणों का व्रतबन्ध संस्कार इस तथ्य का प्रमाण है कि कोई भी जातक जन्म से द्विज नहीं होता और व्रतबन्ध संस्कार जातक को द्विज बनने की विधि है व्रतबन्ध संस्कार में वटु के दीक्षित होने उपरांत उसे सर्वप्रथम उसे भिक्षा मांगने की शिक्षा दी जाती है, भिक्षा मांगने के इस उपक्रम का मूल उद्देश्य बटु के अहंकार को नष्ट करना होता है अर्थात ब्राह्मण होने की प्रथम अनिवार्य आहर्ता अहंकार रहित होना है। वैदिक काल में ब्राह्मण शिक्षक, पुरोहित, चिकित्सक, वैज्ञानिक, कवी, और राज गुरू जैसे दायित्वों का निर्वहन करता था वो भी बगैर किसी पारिश्रमिक के उस काल में विप्र को एक समय के अन्न के संचय का भी अधिकार नहीं था और वो प्रतिदिन भिक्षा के अन्न पर जीवित रह समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करता था तब जा कर इस भारतीय समाज में ब्राह्मण को सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त हुई थी कालांतर में एक कुपरंपरा स्थापित हो गईऔर ब्राह्मण कुल में जन्मा प्रत्येक जातक प्रतिष्ठा का हकदार बन गया।

गत वर्षों में साम्हणों की एकता के प्रयासों में जिस तरह से भगवान परशुराम के रौद्र रूप को ब्राह्मणों  के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है वो भी इस समाज के लिए चिंतन का विषय है। परशुराम  के अवतार एकमात्र सत्य है कि भगवान विष्णु ने त्रेता युग में निरंकुश सत्ता को नियंत्रित करने हेतु परशुराम  अवतार लिया था और  पृथ्वी से कुशासन को विस्थापित कर सुशासन की स्थापना की किन्तु वर्तमान परिवेश में जिस तरह भगवान परशुराम  को चित्रित किया जा रहा है वो वर्ण संघर्ष की आग में घी की आहूति के अलावा कुछ भी नहीं है. हम सभी को इस तथ्य को स्वीकारना होगा कि परशुराम का अवतार न तो किसी वर्ण विशेष को नष्ट करने के उद्देश्य से हुआ था और नहीं किसी वर्ण विशेष को हिंसक गतिविधियों हेतु अधिकृत करने के उद्देश्य से हुआ था। भगवान परशुराम विष्णु के अवतार थे उन्होंने संपूर्ण धरा पर कुशासन को विस्थापित कर सुशासन की स्थापना की किन्तु समस्त राजकुलों को जीतने वाले परशुराम अपने अहंकार को ना जीत सके।

आज समाज में उठने वाले नैतिकता के सभी प्रश्नों के उत्तर वेदों , उपनिषदों और पुराणों में उपलब्ध हैं किन्तु हम इन ग्रंथों को मात्र पढ़ने या सुनने का काम करते हैं जबकि आवश्यकता है इन ग्रंथों को गुनने की यदि हम इन्हे गुनेंगे तो तो सत्य और ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग स्वयमेव प्रशस्त हो जायेगा उदाहरण के लिए रामायण में परशुराम और राम के युद्ध का वर्णन है जिसमें राम के हाथों परशिराम परास्त होते हैं।  हम सब जानते हैं कि परशुराम और राम दोनों ही नारायण के अवतार हैं अर्थात दोनों एक हैं फिर कोई व्यक्ति स्वयं से कैसे युद्ध कर सकता है ?
दरअसल डार्विन के फ़र्ज़ी विकासवाद के सिद्धांत को मानने वालों को समझना होगा कि पृथ्वी पर जीवों के विकासवाद का मूल स्वरुप  विष्णु के दस अवतार में निहित है  आइये विष्णु के दस अवतारों में विकासवाद को समझते हैं , प्रथम मत्स्य अवतार सर्वप्रथम जीव की उत्पत्ति जल में हुई थी बगैर हाथ पेअर के मछली के रूप में फिर उस्का विकास हुआ और हाथ पाँव विकसित हुए जल और थल में विचरण करने वाले सरीसृप कछुए के रूप में दूसरा अवतार कूर्मावतार , फिर सरीसृप से पशु के रूप में विकसित हुआ तीसरा अवतार सूअर एक पशु के रूप में वराह अवतार , फिर विकास हुआ आधे पशु और आधे मनुष्य के रूप में चौथा अवतार नरसिंघ अवतार , फिर अपूर्ण मनुष्य के रूप में अहंकार और क्रोध युक्त पांचवा अवतार परशुराम अवतार , फिर एक परिपक़्व मनुष्य के रूप में क्षमा , दया ,त्याग ,  धीर , शौर्य और मर्यादा संपन्न मर्यादा पुरषोत्तम के रूप में छठा अवतार राम।  अब परशुराम और राम का युद्ध दरअसल अंतर्द्वन्द है जिसमें विवेक और विनय से अहंकार परास्त हो जाता है शास्त्रों की जगह शास्त्र धारण करने वाले परशुराम  ज्ञान की जगह अहंकार पलने वाले परशुराम , त्यागऔर तप की जगह क्रोध पलने वाले परशुराम , क्षमा , दया ,त्याग ,  धीर , शौर्य , शील , विनय और मर्यादा संपन्न राम से परास्त होकर अपने क्रोध और अहंकार से मुक्त होते हैं और वास्तविक ब्राह्मणत्व को प्राप्त करते हैं ।

जिस वर्ण की प्रतिष्ठा का आधार त्याग, तपस्या और सेवा हो उस वर्ण के आदर्श महर्षि दधीचि के अलावा  कोई  हो ही नहीं सकता , अतः वर्तमान परिवेश में जो व्यक्ति अहंकार, ईष्यां घृणा व लोभ का त्याग कर अपने समय, परिश्रम, धन अथवा ज्ञान में से जो भी संभव हो लोककल्याण हेतु अर्पित करे वही श्रेष्ठ नर और वही असल विप्र कहलायेगा और ऐसा करने के पश्चात उसे सामाजिक प्रतिष्ठा तलाशने की आवश्यकता भी नहीं होगी प्रतिष्ठा स्वयं चल कर उसके पास आएगी।

विश्वामित्र जन्म से ब्राह्मण नहीं थे उन्होंने तप से ब्राह्मणत्व अर्जित किया ब्रह्मृषि की पदवी प्राप्त की और सप्तऋषियों में स्थान प्राप्त किया । वाल्मीकि और वेदव्यास भी जन्म से ब्राह्मण नहीं थे उन्होंने भी तप से ब्राह्मणत्व अर्जित किया रामायण , महाभारत और श्रीमद् भागवत् की रचना की और महिर्षि कहलाए । रावण जन्म से ब्राह्मण था किंतु अहंकार की वजह से राक्षस कहलाया  , भगवान ने गीता में कर्म की महत्ता बताई है जन्म की नहीं । जिन्हें जन्म से ब्राह्मण होने का गर्व है वो गर्व नहीं उनका अहंकार है और अहंकार का त्याग ब्राह्मणत्व की प्रथम और अनिवार्य अहर्ता है । जिसे ब्रह्म ज्ञान हो जाय वही ब्राह्मण है और जिसे ब्रह्म ज्ञान है उसमें अहंकार हो ही नहीं सकता ।

 अतः वो रामभद्राचार्य हों या संसार के कोई भी आचार्य हों यदि वो ये कहते हैं की मनुष्य जन्म से ही ब्राह्मण होता है तो ये उनका अहंकार ही है और जिसमे अहंकार है वो स्वयं ब्राह्मण नहीं है चाहे वो किसी भी कुल में क्यों न जन्मा हो और फिर वर्तमान परिस्थितियों में लव जेहाद और धर्मांतरण से जूझ रहे सनातनी समाज में एकता लाने के लिए पहली आवश्यकता सनातनी समाज को इस जन्माधिरत वर्ण व्यवस्था से पूर्णतः मुक्त करने की है ना कि वर्णाधारित अहंकार पाल समाज को वर्णों में विभक्त करने की  .
आज के लिए इतना ही अगली किश्त में विश्लेषण करेंगे फिर किसी नए विषय का तब तक के लिए आज्ञा दें और यू ट्यूब पर हमारे इस चैनल को सब्स्क्राइब करें फेस बुक पेज ज़ोर इस्टाग्राम पर इसे लाइक करें। आपका बहुत बहुत आभार।  उत्तिष्ठ भारतः 

By editor