न्याय पालिका और कार्यपालिका में टकराव से बड़ा संवैधानिक संकट !दिल्ली में तूफ़ान से पहले की खामोशी !

पिछले सप्ताह देश में दो बड़ी घटनाएं घटी पहली पश्चिम बंगाल से है जहाँ वक्फ बोर्ड अधिनियम में संशोधन के विरोध में हिंसक साम्प्रदायिक उन्माद फूटा और इस घटना में राज्य सरकार के परोक्ष समर्थन को लेकर बहस जारी है सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस और केंद्र की सरकार की भारतीय जनता पार्टी में साँप – नेवले का बैर है अतः ऐसी घटनाओं पर दोनों पक्षों द्वारा एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप सामान्य सी बात है लेकिन इस घटना में इससे अलग जो बात सामने आई है वो ममता बेनर्जी का विचित्र सा बयान है , ममता बेनर्जी ने मुषिदाबाद की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इन घटनाओं के पीछे बी एस एफ का हाथ है , बी एस एफ ने बांग्ला देश की सीमा को खोल कर बांग्ला देशी दंगाइयों को प्रवेश दिया और दंगा करने बाद उन्हें सुरक्षित वापस जाने का रास्ता भी दिया। ये बड़ा राजनैतिक बयान है और इस देश में स्वतंत्रता के बाद राजनीती द्वारा फौज के खिलाफ दिया गया पहला बयान मन जा सकता है हालाँकि इससे पहले अरविन्द केजरीवाल , राहुल गाँधी , कन्हैया कुमार और कुछ वामपंथी नेताओं द्वारा सेना के विरुद्ध अनर्गल बयान बाजियां हुई हैं लेकिन अपने ही देश में दंगे करने के लिए विदेशी घुसपैठ करवाने का आरोप वो भी बी एस एफ पर ये इस देश में फौज पर राजनीती द्वारा लगाया गया सबसे बड़ा आरोप है ममता बेनर्जी केंद्र सरकार , बी जी पी , RSS, राज्यपाल पर इससे पहले भी आरोप लगाती रही हैं इसे आम राजनैतिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता रहा है लेकिन देश के सबसे बड़ी सुरक्षा बल पर आरोप वो भी बिना किसी प्रमाण के ये राजनैतिक पतन की पराकाष्ठा तो है ही साथ ही साथ सुरक्षा बल और केंद्र सरकार के सम्मान पर प्रश्न चिन्ह भी है जिस पर केंद्र सरकार के मौन को सहज रूप में नहीं लिया जा सकत । इस बयान के बाद मीडिया में और आम जन में ये चर्चा जोरों पर है कि क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगेगा , राष्ट्रपति शासन लगेगा या नहीं लगेगा ये सब भविष्य के गर्भ में है और दो को छोड़ कोई नहीं जनता की क्या होगा लेकिन जो मोदी और शाह को जानते हैं वो किसी बड़े सरप्राइज़ के लिए तैयार हैं ।

दूसरी बड़ी घटना हुई , तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सर्वोच्च न्यायलाल का एक निर्णय आया है।  तमिल नाडु सरकार द्वारा विधानसभा में पारित कुछ विधेयक कई दिनों तक राज्यपाल  के पास पड़े रहे राज्यपाल ने उनपर ना तो मंजूरी दी ना उन्हें वापस लौटाया और काफी समय बीतने के पश्चात उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया राष्ट्रपति से भी न मंजूरी मिली न विधेयक वापस लौटाए गए इस पर तमिल नाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में याचिका दाखिल की । सर्वोच्च न्यायलय के दो न्यायधीशों की युगलपीठ ने इस पर जो निर्णय दिया वो इस देश के सर्वोच्च न्यायलय द्वारा दिया गया आज तक का सबसे बड़ा और विचित्र निर्णय है।इस देश  के इतिहास में पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने देश के राष्ट्रपति के खिलाफ रिट मेंडमस जारी करते हुए राष्ट्रपति को निर्देशित किया है कि किसी भी विधान सभा अथवा संसद से पारित किसी बिल को राष्ट्रपति तीन महीने से ज्यादा रोक नहीं सकते तीन महीने से ज्यादा रोका गया तो उस बिल को मंजूर माना जायेगा। हमारे संविधान का अनुच्छेद 361 भारत में राष्ट्रपति और राजयपाल दोनों को लीगल इम्युनिटी अर्थात वैधानिक प्रतिरोध प्रदान करता है जो निम्नानुसार है।

( 361) राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल या राजप्रमुख अपने पद की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और पालन के लिए या उन शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और पालन में उसके द्वारा किए गए या किए जाने हेतु तात्पर्यित किसी कार्य के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा।

संविधान के अनुच्छेद 361के इस प्रावधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का तमिलनाडु सरकार  की याचिका पर दिया गया आदेश सीधे सीधे संविधान का उलंघन है वैसे भी संवैधानिक मामलों को सुनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में  कंस्टीटूशन बेंच की व्यवस्था है लेकिन जिस युगलपीठ का ये निर्णय है वो संविधान पीठ नहीं है अतः संवैधानिक मामले पर इस पीठ का का ये निर्णय आश्चर्यजनक होने के साथ साथ न्यायपालिका , कार्यपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र और अधिकारों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करने वाला है।  

बीते सप्ताह देश में घटी ये दो घटनाएं जितनी बड़ी थी उन पर वैसी ही बड़ी प्रतिक्रिया भी अपेक्षित थी लेकिन वैसी कोई बड़ी प्रतिक्रिया आई नहीं। दोनों घटनाओं का प्रतिकूल असर केंद्र सरकार पर पड़ा है या ये कह सकते हैं दोनों घटनाएं केंद्र सरकार के लिए प्रतीकूल असर करक घटनाएं थी किन्तु केंद्र सरकार की तरफ से इन घटनाओं पर त्वरित और विपरीत प्रतिक्रिया नहीं आई। इन दोनों घटनाओं के बाद दिल्ली की कुछ खामोश हलचलें ये बता रही हैं कि सब कुछ सामान्य नहीं है और ये ख़ामोशी किसी बड़े तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी है। बुधवार को केंद्र सरकार की कैबिनेट की बैठक स्थगित हुई ,  प्रधानमंत्री का जम्मू कश्मीर दौर तय था जो स्थगित कर दिया गया , गृह मंत्रालय  के सूत्रों के अनुसार अगले एक सप्ताह के सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं ,  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति से मुलाक़ात की , किस विषय को लेकर मिले ये कोई नहीं जनता , केंद्र सरकार के सारे बड़े मंत्री बी जे पी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा से मिले , फिर प्रधान मंत्री से भी मिले।  सरसरी तौर पर इसे आम घटना के रूप में देखा जा सकता है लेकिन  प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली अब सारा देश परिचित हो गया है वे जब भी कुछ बड़ा करते हैं अचानक और विस्फोटक तरीके से करते हैं सत्ताधारी पार्टी के शीर्ष नेताओं और कैबिनेट के मंत्रियों को भी पहले से कुछ खास पता नहीं होता केंद्र सरकार के बारे में कहा जाता है कि कब क्या होना है ये दो को छोड़ तीसरे आदमी को भी मालूम नहीं होता। कुल मिलाकर दिल्ली में अजब सी ख़ामोशी है और ये ख़ामोशी निश्चित रूप से किसी बड़े तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी है आप बस नज़रें रखे रहिये आने वाले दिनों में इन दोनों घटनाओं के परिपेक्ष्य में बड़ी और विस्फोटक प्रतिक्रिया का होना तय है ।  

By editor