आज के विश्लेषण का विषय है पिछले चालीस वर्षों में बदलता हुआ राजनैतिक परिदृश्य विशेषकर छत्तीगढ़ और दुर्ग जिले की राजनीती के सन्दर्भ में। इतने राजनीती ने कैसी कैसी करवटें लीं कौन कौन बड़े प्रभावशाली नेता हुए नेताओं के जनता और अपने कार्यकर्ताओं से कैसे रिश्ते रहे कार्यकर्ताओं के महत्त्व और दर्जे में क्या अंतर आया इन सभी विषयों पर आज हम चर्चा करेंगे। सबसे पहले तो बात छत्तीसगढ़ के प्रभावशाली नेतों की जब इनकी बात होगी तो हमें चालीस वर्षों से भी पीछे जाना होगा और पहला नाम होगा अविभाजित मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की वे इस प्रदेश के पहले प्रभावशाली नेता हुए जिनका दबदबा पंडित जवाहरलाल नेहरू पर भी भारी पड़ा था पंडित रविशंकर शुक्ल के मुख्यमंत्रित्व काल में जब छत्तीसगढ़ के अयस्क से इस्पात बनाने के लिए विदर्भ में िस्पंत सेंटर स्थापित करने का प्रस्ताव आया तो इस प्रस्ताव के विरोध में पंडित रविशंकर शुक्ल ने अपनी पूरी केबिनेट के साथ त्याग पत्र दे दिया और पंडित जवाहरलाल नेहरू पर ऐसा दबाव बनाया कि उनको वो सयंत्र छत्तीसगढ़ में लगाने हेतु बाध्य कर के रख दिया उसी के परिणामस्वरूप भिलाई में एशिया के सबसे बड़े इस्पात सयंत्र का निर्माण हो सका और यही सयंत्र छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास की नींव बना।
पं रविशंकर शुक्ल की बाद पीढ़ी में जो राष्ट्रिय स्तर प्रभावशाली नेता हुए उनमे श्यामाचरण शुक्ल , विद्याचरण शुक्ल , बिसाहूदास महंत , पुरुषोत्तम कौशिक , बृजलाल वर्मा , पवन दीवान , चंदूलाल चंद्राकर , मोतीलाल वोरा , अरविन्द नेताम , परसराम भरद्वाज ,लखीराम अग्रवाल रमेश बैस , दिलीप सिंह जूदेव , बलिराम कश्यप ,अजीत जोगी , डॉ चरणदास महंत , विष्णु देव साय ,डॉ रमन सिंह , भूपेश बघेल रहे। इनके अतिरिक्त प्रदेश की राजनीति में बड़ा प्रभाव रखने वालों में मनहरलाल पांडेय ,बृजमोहन अग्रवाल , प्रेमप्रकाश पांडेय , वासुदेव चंद्राकर ,प्यारेलाल कँवर , राजेंद्रप्रसाद शुक्ल नन्द कुमार पटेल , महेंद्र कर्मा , रविंद्र चौबे , चंद्रशेखर साहू , विजय गुरु , सत्य नारायण शर्मा , ताम्रध्वज साहू , मोहम्मद अकबर , हेमचंद यादव , ननकीराम कँवर , अमर अग्रवाल , जैसे दिग्गज रहे वर्तमान में में तोखन साहू , विजय बघेल , अरुण साव , विजय शर्मा ,ओ पी चौधरी , केदार कश्यप और गजेंद्र यादव जैसे धाकड़ नेता हैं।
आज की चर्चा का विषय है कि तमाम बड़े और प्रभावशाली नेताओं में वास्तविक जान नेता और कार्यकर्ताओं के पसंदीदा नेता कौन हुए ?
तो चर्चा शुरू करते हैं शुक्ल बंधुओं से श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल की कार्यशैली एक दुसरे से एकदम विपरीत थी श्यामाचरण अति दूरदर्श नेता थे राज्य के विकास को लेकर उनकी सोच बहुत ऊंची ऊंची थी छत्तीसगढ़ में सिंचाई को लेकर उन्होंने जो काम किया उतना उनके बाद के सालों में आज तक कोई ना कर सका गंगरेल बाढ़ उन्ही की दें है किन्तु अति सिद्धांतवादी होने के साथ साथ अति स्पष्टवादी भी थे उन्हें नीति विपरीत कोई भी बात हजम नहीं होती थी और अपने करीबी से करीबी कार्यकर्त्ता को छोटी सी गलती पर सार्वजानिक रूप से झिड़क देते थे ख़ास कर चुनावों में उनका कोई भी कार्यकर्त्ता चाह कर भी अनैतिक साधनों का उपयोग नहीं कर सकता था मददताओं से भी उनका बहुत ज्यादा प्रत्यक्ष संपर्क नहीं होता था कार्यकर्त्ता और जनता दोनों उनके पास छोटे मोटे काम लेकर जाने की हिमत नहीं करते थे।
18 वर्ष के तरुण से लेकर 88 वर्ष के बुजुर्ग भी जिन्हे भैय्या कहते थे वे विद्याचरण शुक्ल तेज तर्रार दबंग और साम दाम दंड भेद हर प्रकार की नीति में निपुण थे विद्या भैय्या सही मायनों में छत्तीसगढ़ के पहले बड़े जन नेता थे इंदिरा जी से लेकर नरसिम्हा राव तक की कैबिनेट में रहे और पूरे छत्तीसगढ़ में उनका अपना व्यक्तिगत कैडर था वो कभी भी यस मैन नहीं रहे इसलिए समय समय पर हाई कमान से भीड़ कर
पार्टी बदलते रहे बगावत उनकी तासीर थी 2003 में एन सी पी में जाकर छत्तीसगढ़ की पूरी 90 विधासभा सीटों पर चुनाव लड़वाया और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की सरकार को अपदस्थ करने में सबसे बड़ी भूमिका उन्ही की रही। जनता की तरफ से जो भी समस्या उनके पास आती वे तत्काल उसका निवारण करते थे वे पद रहे तब भी और जब नहीं थे तब भी किसी के भी काम के लिए किसी को भी फोन करने में नहीं हिचकते थे और फोनपर बात करने का उनकी अपनी एक विशिष्ट शैली थी बड़े से बड़े मंत्री / अधिकारी जिस किसी को भी फोन करते पूरी शिष्टता के साथ पहले उनका हालचाल पूछते फिर अपना काम बता कर उतनी ही शिष्टता से आदेशात्मक अंदाज़ में कहते इसे करके हमें बताइयेगा। नेताओं के लिए समर्पित लाखों कार्यकर्त्ता होते हैं किन्तु कार्यकर्ताओं के लिए समर्पि कुछ ही नेता होते हैं जिनमे से एक विद्याचरण शुक्ल थे ये उनके कार्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता थी इनके हर कार्यकर्त्ता को लगता था कि वही उनका सबसे प्रिय कार्यकर्त्ता है। अपने कारकर्ताओं को आर्थिक रूप से मजबूत करना हमेशा से उनकी पहली प्राथमिकता होती थी वे जब तक पावर में रहे उन्होंने अपने हर कायकर्ता के आर्थिक हितों का ध्यान रखा और अपने कार्यकर्ताओं को आर्थिक मजबूती दिलवाई।
शुक्ल बंधुओं के बाद प्रभावी नेताओं में अजीत जोगी का नाम आता है पूर्व आई ए एस अधिकारी और छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी बहुत दबंग नेता थे और एक समय में इनके पास भी कार्यकर्ताओं अपना बहुत मजबूत कैडर था और अपने कार्यकर्तों को इन्होने भी काफी हद तक उपकृत किया लेकिन पुत्र मोह कि विवशता ने अंतिम दिनों में अजीत जोगी को लाचार बना दिया ।
अब चर्चा करते हैं जशपुर राज परिवार के कुमार दिलीप सिंह जूदेव के विषय में दिलीप सिंह जूदेव पूरे देश में चर्चा विषय बन गए जब 1988 खरसिया उपचुनाव में दिलीप सिंह जूदेव ने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और धाकड़ नेता अर्जुन सिंह के पसीने छुड़वा दिए उस चुनाव में जहाँ अर्जुन सिंह समर्थक नॉट बांटे फिर रहे थे वहीँ खरसिया के मतदाता दिलीप सिंह जूदेव के पैर धो धो कर उन्हें खुद पैसे देते थे दिलीप सिंह जूदेव का एक अलग औरा था राजसी मिज़ाज़ भी था और जनसेवक की विनम्रता भी ऑपरेशन घर वापसी हज़ारों आदिवासी ईसाईयों को पुनः हिन्दू बनाने का उनका एक महती प्रकल्प था और आर्थिक आभावों के बावजूद शक्तिशाली ईसाई मिशनरियों से अकेले लड़ते थे 1999 में अटल जी सरकार में मंत्री बने और 2003 के छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव में अजीत जोगी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थे इसीलिए एक षड्यंत्र के तहत स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें फंसा कर चुनाव की रेस से बहार कर दिया गया बावजूद इसके दिलीप सिंह जूदेव ने 2003 के छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव में अपनी मूछें दांव पर लगा कर अजीत जोगी को चुनाव जीतने की चुनौती दी इस चुनाव में वे सबसे बड़े स्टार प्रचारक रहे और जोगी को निपटा कर ही छोड़ा। ऊके कार्यकर्ताओं से उनके सम्बन्ध भगवान और भक्त वाले थे अपने कार्यकर्ताओं के लिए उनके मन में असीम स्नेह था और कार्यकर्ताओं के मन में उनके लिए असीम श्रद्धा निश्चित रूप से राजनीती में इतना विशाल व्यक्तित्व बार बार नहीं
दिखता।
अब बारी है राजीव गाँधी , नरसिम्हा राव और सोनिया गाँधी के प्रिय पात्र अविभाजित मध्य प्रदेश के दो बार के मुख्यमंत्री , केंद्रीय मंत्री , उत्तर प्रदेश के राजयपाल और अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के लम्बे समय तक कोषाध्यक्ष रहे कांग्रेस के अत्यंत प्रभावशाली राष्ट्रिय नेता तथा दुर्ग के पूर्व विधायक और राजनाँदगाँव के पूर्व संसद बाबू जी के नाम से लोकप्रिय मोतीलाल वोरा की , मोतीलाल वोरा की पहचान एक अत्यंत सहज और सरल नेता के रूप में थी राष्ट्रिय स्तर के इतने बड़े नेता होने के बावजूद वो अपने क्षेत्र के अधिकांश कार्यकर्ताओं को चेहरे और नाम से जानते थे।

