इटावा में मानवता हुई शर्मसार !जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता !हिंदू एकता में वर्ण व्यवस्था सबसे बड़ी बाधा !

22 जून 2025 को उत्तर प्रदेश के इटावा में कथा वाचकों का  जातीय आधार पर उत्पीड़न किया गया बताया जा रहा है कि कथा वाचकों के सर मुंडवाए गए ,  उन्हें पीटा गया उनसे जमीन चटवाई गई  और उनपर मूत्र छिड़का गया। कथावाचकों का अपराध सिर्फ इतना था कि वे  ब्राह्मण न होकर यादव थे ! मानवता को शर्मसार कर देनी वाली इस घटना पर हिन्दू समाज उतना उद्वेलित नहीं हुआ जितना कि उसे होना चाहिए था लेकिन इस प्रकरण में  राजनीति तत्काल सक्रीय हो गई उत्तर प्रदेश के एक नेता  का बयान और फिर उस पर त्वरित प्रतिक्रियाएं।  गत कुछ वर्षों से दक्षिण पंथी राजनैतिक दल देश भर में हिन्दुओं को एक करने में जुटे हैं और बंटोगे तो कटोगे का नारा दे रहे हैं।  तो वहीँ दूसरी तरफ जन्म के आधार पर अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने वाले ऐसी घृत हरकतों से समाज में विभाजन की स्पष्ट रेखा खींचने में लगे हैं।  

जन्म से ब्राह्मण कहलाने वाले आत्ममुग्ध और स्वयंभू विद्वानों का एक वर्ग जिसे लगता है कि कथा पूजा कर्मकांड पर उसका जन्म सिद्ध अधिकार है !  ये वर्ग  मूढ़मति , अज्ञानी , अहंकारी और ईर्ष्यालु तत्वों का समूह है जिसे ब्राह्मण होने का अर्थ ही नहीं मालूम जो किसी कुल विशेष में जन्म लेने मात्र के आधार पर स्वयं को समाज के सर्वोच्च शिखर पर विराजित होने का भ्रम पालता है।  

आइये आज की चर्चा में कथा वाचन तथा ब्राह्मण होने के आधारों पर चर्चा करते हैं।

सर्वप्रथम तो हमे यह जानना अनिवार्य होगा कि वर्ण व्यवस्था के प्रारंभिक दौर से ही ब्राह्मणों को समाज में जो सर्वोच्च  स्थान प्राप्त हुआ उसका कारण क्या था ?
 इसमें एक अहम्  प्रश्न आता है  ,
 क्या ब्राम्हण की प्रतिष्ठा उसके जन्म पर आधारित थी ?
 अर्थात  क्या किसी कुल विशेष में जन्म लेने मात्र से ही जातक ब्राम्हण हो जाता है  ?

इन दोनों प्रश्नों का उत्तर यस्क मुनि ने सहस्त्रों  वर्ष पूर्व दे रखा है, यस्क मुनि के अनुसार

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः ।
वेद पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्मा जानातीति ब्राह्मणः ।।

अर्थात- व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ग्रह्मा को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
इसी प्रकार महाभारत में युधिष्ठिर ने कहा है ,  जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सदाचार, परोपकार, धर्म का पालन और दया दिखाई देती है, वही ब्राह्मण है चाहे वो किसी भी कुल में क्यों न जन्मा हो।  

तब अगला अहम प्रश्न आता है कि आदि काल से भारतीय समाज में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा का आधार क्या था ? वर्ण व्यवस्था के आरंभिक काल के अध्ययन से हम पाते हैं कि उस समय वर्णों का निर्धारण जन्म पर आधारित न हो कर कर्म पर आधारित था ।
उस समय की सामजिक व्यवस्था आज की प्रशासनिक व्यवस्था की तरह थी जिस तरह प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारी कर्मचारियों को चार वर्ग अथवा श्रेणियों में बांटा गया है और ये श्रेणियां कर्म के अनुसार निर्धारित की गई हैं , आज भी कलेक्टर प्रथम श्रेणी ,  तहसीलदार द्वितीय श्रेणी , लिपिक तृतीय श्रेणी , और भृत्य , अर्दली आदि चतुर्थ श्रेणी में गिने जाते हैं किन्तु अर्दली के बेटे का अर्दली होना या कलेक्टर के बेटे का कलेक्टर होना अनिवार्य नहीं है।  ठीक उसी प्रकार वैदिक काल में कोई भी मनुष्य अपने कर्मानुसार वर्ण चुनने का अधिकार रखता था।  ब्राह्मणों का यज्ञोपवीत  संस्कार इस तथ्य का प्रमाण है कि कोई भी जातक जन्म से द्विज नहीं होता और यज्ञोपवीत संस्कार जातक को द्विज बनने की विधि है यज्ञोपवीत संस्कार में वटु के दीक्षित होने उपरांत उसे सर्वप्रथम उसे भिक्षा मांगने की शिक्षा दी जाती है, भिक्षा मांगने के इस उपक्रम का मूल उद्देश्य बटु के अहंकार को नष्ट करना होता है अर्थात ब्राह्मण होने की प्रथम अनिवार्य आहर्ता अहंकार रहित होना है। महर्षि विश्वामित्र जो एक चक्रवर्ती राजा थे उन्होंने ब्राह्मण बनने के लिए हर संभव उपाय किये और ब्राह्मण बन गए। और भगवन ब्रह्मा के पुत्र महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और महर्षि विश्रवा का पुत्र चारों वेदों का ज्ञाता , तीनों लोकों का विजेता रावण , श्रेष्ठ कुल में जन्म लेकर भी अपने अहंकार  के कारण ब्राह्मण होने की आहर्ता प्राप्त न कर सका।  

 वैदिक काल में ब्राह्मण शिक्षक, पुरोहित, चिकित्सक, वैज्ञानिक, कवी, संगीतज्ञ , शस्त्र कला प्रशिक्षक और राज गुरू जैसे दायित्वों का निर्वहन करता था वो भी बगैर किसी पारिश्रमिक के उस काल में  ब्राह्मण को एक समय के अन्न के संचय का भी अधिकार नहीं था  , वो प्रतिदिन भिक्षा के अन्न पर जीवित रह समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करता था तब जा कर इस भारतीय समाज में ब्राह्मण को सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त हुई थी। सीधा सीधा सिद्धांत है लोक कल्याण के लिए त्याग करने के कारन ब्राह्मणो को सम्मान मिला नाकि किसी कुल विशेष में जन्म लेने के कारण , किन्तु  कालांतर में ये परंपरा बन गयी और ब्राह्मण कुल में जन्मा प्रत्येक जातक स्वयं को प्रतिष्ठा का हकदार समझने लगा ।

अब बात करते है कथा वाचन कि तो स्वयं को जन्म के आधार पर ब्राह्मण मानने वाले और कथा वाचन  पर अपना पैतृक अधिकार समझने वाले अल्प मति अभिमानियों को सबसे पहले ये ये जान लेना आवश्यक होगा कि उनके पुरखे जिन कथाओं का वाचन करके मान सम्मान , यश कीर्ति और धन सम्पदा अर्जित कर रहे हैं उसमे दो ही प्रमुख कथाएं  हैं जो सब से ज्यादा पढ़ी और सुनी जाती हैं वो है रामायण और भागवत , रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जन्म से ब्राह्मण नहीं थे और श्रीमद भागवत के रचयिता महर्षि वेद व्यास भी जन्म से ब्राह्मण नहीं थे , ऐसे में जिन कथाओं को लिखने वाले ब्राह्मण नहीं थे उन कथाओं को पढ़ने पर ब्राह्मण का एकाधिकार कैसे हो सकता है।  और फिर आज के इस आधुनिक काल में वर्णाश्रम के अनुसार जब सैनिक होने पर क्षत्रिय का एकाधिकार नहीं है , व्यापारी होने पर वैश्य का एकाधिकार नहीं है , श्रमिक होने पर शूद्र का एकाधिकार नहीं है तो फिर कथा पूजा पर ब्राह्मण का एकाधिकार कैसे संभव है ?
आज  पूरे देश में हिन्दुओं की एकता की मुहिम चल रही है लेकिन हिन्दुओं में जब तक वर्ण भेद रहेगा तब तक ये एकता संभव ही नहीं है और इसके लिए सबसे बड़ी पहल उस समाज से होनी है जो जन्म केआधार पर स्वयं को दुसरे से श्रेष्ठ समझने लगा है।  
जन्म से ब्राह्मण कहलाने वालों को , उग्र रूप वाले  भगवान् परशुराम को आदर्श मानने  वालों को , स्वयं को दुसरे से श्रेष्ठ समझने का अहंकार पालने वालों को ये समझना होगा कि ब्राह्मण की प्रतिष्ठा का आधार उसका जन्म नहीं बल्कि ज्ञान , तपस्या और लोक कल्याण के लिये त्याग रहा है इसलिए शस्त्र धारी परशुराम को आदर्श मानने वाले कथित ब्राह्मण ये जान लें कि  ज्ञान और त्याग के प्रतीक ब्राह्मण का आदर्श महर्षि दधीचि के अलावा कोई  हो ही नहीं सकता अतः ब्राम्हण अपने पुरखों की तप, त्याग, और सेवा की गौरवशाली परंपरा का परिपालन करके , स्वयं के श्रेष्ठ होने के अहंकार को त्याग के और हिन्दू समाज से वर्ण व्यवस्था का पूर्ण निर्मूलन करके ही हिन्दू समाज में एकता ला सकता है ।

By editor