कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए .

उत्तिष्ठ भारतः , मैं हूँ राजीव चौबे और आप देख रहे हैं राष्ट्रीय चेतना न्यूज़, आर सी एन में आपका स्वागत है। दुष्यंत कुमार ने क्या खूब कहा है —
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए !
तो आइये जानते है कौन हैं वो लोग जो कमीज़ न हो तो पावों से पेट ढक लेते हैं।

आज के विश्लेषण का विषय है गुलाम , बंधुआ मज़दूर और नौकर  ।    अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत तक पूरे विश्व में गुलामी प्रथा कायम थी ये वो दौर था जब इंसानों की बस्ती में इंसानों की मंडी सजती थी और उनकी बोली लगती थी गरीब और मजलूम इंसान जिनमें बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक स्त्री और पुरूष जानवरों की तरह बिकते थे और इन गुलामों को खरीदने वाला गुलामों से से चाहे जैसा भी काम करवाए जितना भी काम करवाए उसपर किसी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं थी याने कि गुलाम से घर माकन दुकान खेत उद्योग घूरे पैखाने कहीं भी काम करवाया जा सकता था यहाँ तक की हल और कोल्हू में जानवरों की जगह बाँधा जा सकता था ।  काम के बदले किसी भी प्रकार का पारिश्रमिक देने का कोई प्रावधान नहीं था मालिक के रहमोंकरम पर पलने वाले गुलाम को जिन्दा रहने लायक भोजन मिल जाए इतना ही उसके लिए पर्याप्त था।

उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे दशक याने की 1833 में  ब्रिटिश संसद ने दास प्रथा उन्मूलन अधिनियम पारित किया था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य जिसमें भारत भी शामिल था में दासता को समाप्त करने की नींव रखी गई। 1833 के एक्ट के आधार पर, 1843 में भारत में विशेष रूप से कानून लागू किया गया, जिसके बाद गुलामों से जुड़े लेनदेन और उन्हें रखने की प्रथा को गैरकानूनी करार दिया गया। इस कानून के आने के बाद इंसानों की जानवरों की तरह खरीदी बिक्री पर तो पाबन्दी लग गई लेकिन ब्रिटिश भारत और स्वतंत्रता पश्चात के भारत में भी जमींदारों द्वारा कृषि मजदूरों के शोषण का सिलसिला जारी रहा और गुलामों की जगह बंधुआ मजदूरों ने ले ली बंधुआ मजदूरों की स्थिति गुलामों से कुछ ही बेहतर थी बस इतना की की उन्हें मोल देकर खरीदा नहीं जाता था लेकिन शोषण भरपूर होता था ,  बंधुआ मजदूरी (जो गुलामी का ही एक रूप है) बाद के वर्षों में भी छिटपुट रूप से जारी रही, जिसे रोकने के लिए भारत सरकार ने 1976 में बंधुआ मजदूरी प्रणाली उन्मूलन अधिनियम लागू किया। भारत में बंधुआ मजदूरी प्रणाली उन्मूलन अधिनियम को लागु हुए पचास साल हो चुके हैं बावजूद इसके आज भी देश के कई कोनों से  मजदूरों को बंधुआ बनाए जाने की खबरें कदा  मिल ही जाती हैं।

  अधिकतर ऐसी ख़बरें निजी खदानों और ईंट भट्ठों में रखे गए बंधुआ मजदूरों की ही होती हैं  बहरहाल इन बाहुबली निजी व्यवसायिओं द्वारा मजदूरों को बंधुआ बनाया जाना हमारे आज के विश्लेषण का विषय नहीं है हमारे विश्लेषण का विषय है सरकारी बंधुआ मजदूर !!!
जी हाँ चौंकिए मत  दासता उन्मूलन अधिनियम लागू होने के 183 वर्षों के बाद और बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम लागू होने के पचास वर्षों के बाद भी इस देश में सरकारी तंत्र द्वारा बंधुआ मजदूरी करवाई जाती है और खुले आम करवाई जाती है आलम ये है कि बंधुआ मजदूरी से इंकार करने पर सरकारी नौकरी से निकाले जाने या फिर जेल जाने के दर से शासकीय कर्मचारी बंधुआ मजदूर बना हुआ है और अनचाहे काम करने को मजबूर है।  
सुपर हिट हिंदी मूवी शोले में हेमा मालिनी का एक डायलॉग है , अरे ये तो बसंती का टेंगा है किसी जंमीदार की बेगारी थोड़ी है की मर्ज़ी न मर्ज़ी करना ही पड़े। लेकिन प्रश्न ये है बेगारी जंमीदार की ना हो कर यदि सरकार की हो तो किसकी हिम्मत , किसकी हैसियत है जो करने से इंकार कर दे।  
चलिए अब विषय के मूल में आते हैं भारतीय संस्कृति इस दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है इस संस्कृति में गुरु को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है।  ये देश जहाँ हम कहते हैं ,
 गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

इसी देश में आज गुरु जिसे सरकारी कागज़ों में अब शिक्षक कहा जाता है उसे कई वर्षों से बंधुआ मज़दूर बना कर रखा गया है और सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि निजी स्कूलों के नहीं बल्कि शासकीय स्कूलों के शिक्षक वर्षों बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर हैं।  एक शासकीय शिक्षक जिसकी नियुक्ति शासन के शिक्षा विभाग में विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए होती है उस वैध नियुक्ति की आड़ में शासन अवैध तरीके से बेगारी करवाता है , इसकी इलेक्शन ड्यूटी लगती है तो निर्वाचन काल में ये शिक्षक मतदाता सूची में संशोधन का काम करता है , घर घर घूम कर निर्वाचन पर्चियां बांटता है , मतदान केंद्र में मतदान करवाता है फिर मतगणना भी करता है , एस आई आर में ये लोगों के घर घर जा कर मतदाता सूची का पुनरीक्षण का काम करता है , यही शिक्षक , जनगणना में घर घर जा कर आंकड़े एकत्रित करता है कसरकार के लिए तो इतना सब भी कम ही होता है इसीलिए पशु गणना में  यही शिक्षक  पशुओं तक की गिनती का काम करता है जबकि भारत के अलावा पश्चिमी और अमरीकी देशों में यही काम बहुत ही व्यवस्थित होता है 

अधिकांश विकसित देशों में इसके लिए विशेष सरकारी विभाग होते हैं।

  • अमेरिका में United States Census Bureau जनगणना और अनेक सरकारी सर्वेक्षण कराता है।
  • ब्रिटेन में Office for National Statistics यह कार्य करता है।
  • जर्मनी में Federal Statistical Office of Germany सांख्यिकीय कार्यों का प्रमुख निकाय है।

इन संस्थाओं में स्थायी कर्मचारी होते हैं, लेकिन बड़े सर्वेक्षणों के समय अतिरिक्त लोगों की भर्ती भी की जाती है 

जनगणना जैसे विशाल कार्यों के लिए सरकारें लाखों घरों तक पहुँचने हेतु अस्थायी गणनाकर्मी (enumerators) नियुक्त करती हैं 

  • अमेरिका में Census के दौरान हजारों अस्थायी कर्मचारी कुछ महीनों के लिए नियुक्त किए जाते हैं।
  • यूरोप के कई देशों में भी स्थानीय स्तर पर अस्थायी सर्वेक्षक रखे जाते हैं।

कई यूरोपीय देशों में जनगणना का बड़ा हिस्सा सरकारी डेटाबेस से ही तैयार किया जाता है:

  • जन्म-मृत्यु रजिस्टर
  • कर (tax) रिकॉर्ड
  • निवास पंजीकरण
  • सामाजिक सुरक्षा रिकॉर्ड

इससे घर-घर जाकर जानकारी लेने की आवश्यकता कम हो जाती है ।

निर्वाचन का कार्य सामान्यतः:

  • स्थायी चुनाव आयोग,
  • स्थानीय सरकारी अधिकारी,
  • और चुनाव के समय नियुक्त अस्थायी मतदान कर्मियों

के माध्यम से कराया जाता है।

उदाहरण के लिए अमेरिका में चुनावों का संचालन काफी हद तक राज्य और स्थानीय प्रशासन करते हैं, जबकि कई यूरोपीय देशों में राष्ट्रीय या क्षेत्रीय चुनाव आयोग इसकी देखरेख करते हैं ।

पशुगणना प्रायः कृषि मंत्रालय ,सांख्यिकी विभाग,स्थानीय कृषि अधिकारियों के माध्यम से कराई जाती है। कई देशों में किसानों के पंजीकरण (farm registration) और कृषि डेटाबेस के कारण पशुओं का रिकॉर्ड पहले से उपलब्ध रहता है।

संक्षेप में, यूरोप और अमेरिका में ये कार्य मुख्यतः विशेष सरकारी सांख्यिकी एजेंसियों, स्थानीय प्रशासन, अस्थायी सर्वेक्षकों और डिजिटल सरकारी रिकॉर्ड के संयोजन से कराए जाते हैं। भारत की तरह बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को चुनाव या जनगणना ड्यूटी में लगाया जाता है, लेकिन कई विकसित देशों में डिजिटल रिकॉर्ड का उपयोग अधिक होने से मानवबल की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती है।

भारत में हर सरकारी बेगारी के लिए शिक्षकों को जोत दिया जाता है और कोई समाजसेवी संस्था , कोई राजनैतिक दल , कोई आर टी आई एक्टिविविस्ट , कोई पी आई एल विशेषज्ञ , विधायिका ,कार्यपालिका ,न्याय पालिका , पत्रकारिता , कोई ट्रेड यूनियन यहाँ तक कि शिक्षकों की यूनियन ने भी इनके पक्ष में आज तक कोई आवाज़ नहीं उठाई नतीजा ये कि स्थितियां अब इनके लिए बाद से बदतर होती जा रही हैं इसके बावजूद छत्तीसगढ़ शासन के नवीनतम फरमान के अनुसार अब शिक्षकों को ऑन  लाइन अटेंडेंस देना होगा स्कूलों में बायो मेट्रिक्स लगेंगे स्कूलों पे पदस्थ शिक्षक विद्या समीक्षा केंद्र के ऍप के माध्यम से उपस्थिति दर्ज करेंगे कार्य में लापरवाही पर शिक्षक के पिछले माह के वेतन में कटौती होगी। पटवारी , आर आई , तहसीलदार , एस  डी एम , थानेदार , एस पी , कलेक्टर जब मर्ज़ी कार्यालय आ सकते हैं जब मर्ज़ी जा सकते हैं।   शिक्षण कार्य के अलावा सभी बेगरियाँ करने वाले  शिक्षक की लाचारी उसकी मनोदशा , उसके मानसिक तनाव उसकी कुंठा की परवाह किये बगैर हम और आप उससे शैक्षणिक कार्य में भी सर्वश्रेष्ठ परिणाम की अपेक्षा रखते हैं।  

 इस कार्यक्रम के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना न्यूज़ सरकार के संज्ञान में लाना चाहता है कि जिस तरह सरकार सभी निर्माण कार्य ठेके पर करवाती है उसी प्रकार , निर्वाचन , एस आई आर , जनगणना , पशुगणना अदि का काम भी ठेके से करवाए या फिर छात्रों को शिक्षित करने का कार्य ही ठेके पर करवा ले !!!
जाते जाते एक बार फिर दुष्यंत कुमार की कालजयी पंक्तियाँ स्मरण करें !
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
ये तो वक्त ही बताएगा कि ये सूरत कब बदलेगी , इस देश में शिक्षकों के हालत कब बदलेंगे ?

आज के लिए बस इतना ही इसी विषय पर आगे और भी चर्चा करेंगे तब तक के लिए अनुमति दें।  यूट्यूब पर हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें फेस बुक और इंस्टाग्राम पर हमरी पोस्ट को लाइक करें और यदि विडिओ पसंद आये तो इसे अधिक से अधिक शेयर करें।  आपका बहुत बहुत आभार।   उत्तिष्ठ भारत: !!

By editor