भिलाई के मैत्री बाग में सोमवार की सुबह एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई। सफेद बाघिन जया—जिसे नंदनवन जंगल सफारी, रायपुर से बायोडायवर्सिटी संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया था—अचानक मौत के मुंह में चली गई। 11 वर्ष की जया, पिछले 609 दिनों से मैत्री बाग में रह रही थी, लेकिन उसे पिंजरे का माहौल रास नहीं आया। उसकी दहाड़, जो जंगल सफारी में गूंजती थी, मैत्री बाग के पिंजरे में धीरे-धीरे सिमटकर रह गई।
मैत्री बाग प्रभारी डॉ. एन.के. जैन के अनुसार पोस्टमार्टम में उसका अमाशय फटा पाया गया। आशंका जताई जा रही है कि बाड़े में जंपिंग के दौरान अमाशय पलट गया और फट गया—शेर प्रजाति में ऐसी दुर्लभ लेकिन घातक स्थिति कभी-कभी देखी जाती है। और ऐसी स्थिति में 45 मिनट के भीतर मृत्यु हो जाती है। रविवार देर रात तक जया बिल्कुल स्वस्थ थी, लेकिन सुबह उसकी मौत की खबर ने पूरे स्टाफ और शहर को दुखी कर दिया।
जया को 20 मार्च 2024 को जंगल सफारी से यहां लाया गया था और बदले में मैत्री बाग की बाघिन ‘रक्षा’ को खुले जंगल सफारी भेजा गया था। जिस दिन से जया यहां आई, वह अपने बाड़े तक ही सीमित रही, जबकि ‘रक्षा’ नंदनवन के खुले जंगल में आजादी से विचरण करती रही। लेकिन 610वें दिन की सुबह जया की जिंदगी की दहाड़ हमेशा के लिए शांत हो गई।
जया के पोस्टमार्टम की जिम्मेदारी पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय अंजोरा के डॉ. जसप्रीत सिंह और राज्य पशु चिकित्सा विभाग के डॉ. आर.के. गुप्ता ने संभाली। शाम को मैत्री बाग परिसर में सम्मानपूर्वक उसका अंतिम संस्कार किया गया।
लेकिन जया की मौत कोई अलग घटना नहीं है। पिछले दस वर्षों में मैत्री बाग में पांच और बाघों की मौत हो चुकी है—2014 में बाघिन दुर्गा, 2015 में सांप के काटने से नर्मदा, 2019 में बंगाल टाइगर सतपुड़ा, 2021 में वसुंधरा और 2022 में कैंसर से पीड़ित सफेद बाघ किशन। इन मौतों ने शेर प्रजाति के संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देश में सफेद बाघों की कुल अनुमानित संख्या करीब 160 है, जिसमें से 19 सफेद बाघ अकेले मैत्री बाग से विभिन्न चिड़ियाघरों को दिए गए हैं। जया की मौत के बाद अब यहां सिर्फ 6 सफेद बाघ बचे हैं।
साल 1998 से मैत्री बाग में शेरों के कुनबे की शुरुआत भुवनेश्वर के नंदनकानन जू से लाई गई जोड़ियों ‘तापसी’ और ‘नाम’ के साथ हुई थी। तब से इन-ब्रीडिंग रोकने और बायोडायवर्सिटी बनाए रखने के लिए बाघों का आदान-प्रदान लगातार किया जाता रहा है।
लेकिन जया की मौत ने एक बार फिर मैत्री बाग की सुरक्षा व्यवस्थाओं, बाड़ों की संरचना और पशु संरक्षण की नीतियों पर गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं।

