आज के विश्लेषण का विषय है स्वतंत्रता के सही मायने। आज दिनांक 15 अगस्त 2026 इस देश की स्वतंत्रता की अस्सीवीं जयंती है आज हर साल की तरह पूरे देश में हर्षोल्लास का वातावरण है , चरों दिशाओं की हवा में देशभक्ति खुशबू है हर तरफ तिरंगा लहरा रहा है , जगह जगह देश भक्ति के गीत बज रहे हैं , स्व्स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों के स्तुति गीत बज रहे हैं आमजन के मन में देश के लिए मर मिटने का जज़्बा जाग गया है , देशभक्ति का जबरदस्त उबाल है इस उबाल में से इतने प्रचुर मात्रा में ऊष्मा निकल रही है कि उससे सारे देश का स्टीम बाथ हो जा रहा है। आज देर रात तक ये ऊष्मा प्रवाहित होती रहेगी फिर धीरे धीरे ठंडी पड़ने लगेगी और कल सुबह तक देश भक्ति के उबाल पर ठण्ड की परत जम चुकी होगी और अगले छह महीनों के लिए देशभक्ति पूरी तरह बर्फ हो जाएगी फिर 26 जनवरी 2027 की सुबह फिर एक दिन की एक नई लौ जगेगी फिर उबाल आएगा ऊष्मा प्रवाहित होगी और रात तक शांत हो जाएगी 15 अगस्त 1948 से से व्यवस्था निर्बाध रूप से जारी है। भारत के देशभक्त नागरिक के भावुक मन में साल में दो बार देशभक्ति का जज़्बा जबरदस्त उबाल मारता ही मरता है ।
किसी भी व्यवस्था की परिपक्वता के लिए 79 वर्ष की अवधि बहुत बड़ी अवधी होती है बावजूद इसके आज स्वतंत्रता के अस्सीवें पायदान में पहुँचने के बाद भी भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है पर अफ़सोस सबसे अच्छा लोकतंत्र नहीं बन सका है। भारत विश्व का सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र क्यों नहीं बन पाया इसके कारणों का विश्लेषण आज के दिन तो अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। सबसे पहले तो स्वतंत्रता के सही मायनो का समझना और सही मायनों में स्वतंत्र होना अभी बाकी है , स्वतंत्र शब्द का शाब्दिक अर्थ है स्व याने स्वयं का और तंत्र याने व्यवस्था , स्वतंत्र याने स्वयं की व्यवस्था , स्वयं का शासन , अब एक प्रश्न और उठता है यहां स्वयं याने कौन ? निश्चित रूप से लोकतंत्र में स्वयं का अर्थ जनता से है अर्थात यहाँ शासन जनता का है इस लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में शासन चलने के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था की गई है जिसमें शासन चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधि के रूप में स्थानीय निकाय में पंच अथवा पार्षद , विधानसभा में विधायक और संसद में सांसद जनता के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलते हैं। अपने सदन को अपने क्षेत्र की जनभावनाओं से अवगत करते हुए अपने क्षेत्र और देश के विकास के लिए काम करें सदन में अपने क्षेत्र के विकास की मांगों को रखना कानून बनाना सदन में स्वस्थ बहस करना ये इन प्रतिनिधियों का मूल दायित्व होता है। सदन में व्यक्तिगत अहम् की संतुष्टि के लिए काम करने का इनको कोई अधिकार ही नहीं है क्योंकि ये इस शासन प्रणाली में हमारे प्रतिनिधि मात्र हैं अतः सदन में इन्हे जनभावनाओं के अनुकूल ही काम करना चाहिए ! लेकिन इस देश में क्या ऐसा होता है ? आज 15 अगस्त है 13 अगस्त 2026 को संसद का मानसून सत्र समाप्त हुआ पूरे सत्र में विपक्ष ने एक भी दिन सदन की कार्रवाई नहीं होने दी। अब यहाँ अहम् प्रश्न उठता है कि जनता किस लिए संसद में अपने प्रतिनिधियों को चुन कर भेजती है ? ये प्रश्न विपक्ष के पिछले दो दिनों के रवैय्ये के लिए नहीं है बल्कि भारतीय संसदीय परंपरा के प्रारम्भ से आज तक रहे सभी विपक्षी दलों के लिए है कि क्या उन्हें कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि जनता के प्रतिनिधि होने के नाते उनका प्रथम कर्तव्य सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना और सरकार से प्रश्न पूछना है इस देश में संसद का सत्र एक साल में , 365 दिनों में कुल साठ या सत्तर दिनों का होता है और इन साठ सत्तर दिनों के बीस से पचीस दिन हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं याने कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सर्वोच्च पंचायत जनता के चुने प्रतिनिधि आज भी पाषाण युग के इंसानों या व्यवहार कर रहे हैं जिनमें नीति , सिद्धांत , शुचिता और दायित्व का बोध ही नहीं है । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में संसद सत्र के लिए वर्ष भर में निर्धारित कुल दिनों में से लगभग एक तिहाई से अधिक दिन हंगामें की भींत चढ़ जाते हैं। हम जिनको वोट देकर अपना प्रतिनिधि बनाकर हमारी आवाज़ संसद तक पहुँचाने के लिए भेजते हैं वो वहां जा कर सत्ता और विपक्ष की कबड्डी खेलते हैं और एक दुसरे को नीचे दिखने की होड़ में खुद नीचे गिर जाते हैं। जनादेश , जनभावनाएं , जन आवश्यकताएं , जनाक्रोश भाड़ में जाय !
अब अहम् प्रश्न ये उठता है कि ये जनप्रतिनिधि जनभावनाओं के विरुद्ध हर काम कैसे कर लेते हैं दरअसल इस लोकतंत्र में शासन चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधि चुनने की व्यवस्था है और विभिन्न सदनों में जाने वाले हमारे मत से चुने हुए लोग जनप्रतिनिधि होते हैं संसदीय और संवैधानिक शब्दावली में भी इनके लिए प्रतिनिधि शब्द का ही प्रयोग हुआ है लेकिन इस देश की जनता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि इसने अपने पांवों पर खुद कुल्हाड़ी मारी है और अपने ही प्रतिनिधियों को नेता की उपाधि से नवाज़ डाला है संविधान में शायद कहीं भी ये नेता शब्द नहीं आया होगा लेकिन हमें अपने ही प्रतिनिधि को अपना नेता बना डाला अब नेता बनते ही उस प्रतिनिधि में प्रतिनिधित्व का भाव ख़तम हो गया और नेतृत्व का भाव आ गया यही नेतृत्व का भाव उसमे शासक का भाव ला देता है अब हमारा प्रतिनिधि पहले हमारा नेता बना और फिर शासक बन गया और जब वो शासक बन गया तो फिर संसद में हो या फिर मंत्रालय में करेगा तो अपने ही मन की।
आज देश की स्वतंत्रता की अस्सीवीं जयंती पर मैं संसद अथवा विधानसभा की कार्यवाही को बाधित करने के लिए आज के विपक्ष पर ही आरोप नहीं लगा रहा हूँ बल्कि 1952 में जब इस देश के पहले आम चुनाव हुए तब से लेकर आज तक जो भी पार्टियां विपक्ष में रही और जिस कसी राजनैतिक दल ने सदन की कार्यवाही को चाहे एक मिनट के लिए भी बाधित किया उनसे मेरा प्रश्न है क्या ऐसा करने से पहले उसने उन मतदातों की मंशा जानने की कोशिश की जो उन्हें अपने मत से चुन कर सदन में भेजते हैं ? जवाब बड़ा स्पष्ट है नहीं ! इसकी आवश्यकता ही क्या है ? इस जवाब का कारन है कि ऐसा करने के बाद भी जनता उसे फिर से वोट देगी क्योंकि जब भी कोई प्रत्याशी दुबारा चुनाव लड़ता है तो जनता वोट देते समय उसके पिछले कार्यकाल में सदन में उसके काम की समीक्षा कभी नहीं करती जनता को कोई मतलब ही नहीं है कि उसका प्रतिनिधि सदन में कैसी परफॉर्म करता है वो बस ये देखते है कि हमारा पार्षद , विधायक या फिर सांसद हमारे क्षेत्र में कितना ज्यादा आया ? उसका व्यवहार कितना विनम्र है ? शासकीय कार्यालयों , थाने , अस्पताल , तहसील में हमारे लिए फोन करता है अपने निधि से विभिन्न समाजों के लिए राशि दे देता है बस इतना पर्याप्त है।
तो फिर ये तय है कि जबतक जनता अपने प्रतिनिधियों को सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने के लिए बाध्य नहीं करेगी या फिर जबतक संसद में सदन की कार्यवाही को बाधित करने वाले सदस्य की निष्कासन और अगले दस वर्षों तक निर्वाचन में हिस्सा लेने पर प्रतिबन्ध नहीं लगेगा तब तक ये ऐसे ही अपने अहम् की संतुष्टि के लिए सदन की कार्यवाही बाधित करते रहेंगे और आप और मैं घर बैठे अपने भाग्य को कोसते रहेंगे !!

