उत्तिष्ठ भारतः , मैं हूँ राजीव चौबे और आप देख रहे हैं राष्ट्रीय चेतना न्यूज़, आर सी एन में आपका स्वागत है आज के विश्लेषण का विषय है ‘ एनकाउंटर ‘ पिछले डेढ़ साल से इस चैनल पर मुझे देखने सुनने वाले दर्शकों को शायद आज के विषय पर मेरे विचारों से हैरानी हो लेकिन आज जहाँ पूरे देश का मिडिया गोदी मिडिया और विरोधी मिडिया की दो धाराओं में पूरी तरह से विभक्त हो गया है एक सिर्फ साकार की स्तुति में लगा है तो दूसरा सिर्फ साकार के विरोध में तो ऐसी स्थिति में निष्पक्ष पत्रकारिता सरकार और समाज दोनो के लिए ही अनिवार्य आवश्यकता बन गई है इसलिए किसी को तो ये पहल करनी ही होगी। ये तय है कि सत्ता के हर काम को मौन स्वीकृति देना ये पत्रकारिता नहीं चाटुकारिता है इसलिए सरकार अगर अच्छा काम करेगी तो उसकी प्रसंशा भी होगी और गलत करेगी तो प्रश्न भी पूछे जायेंगे , आँखों में आँखें डाल कर पूछे जाएंगे !
पिछले कुछ सालों से पुलिस द्वारा अपराधियों के एनकाउंटर के समाचारों में आशातीत वृद्धि हुई है । आए दिन हमें एनकाउंटर के समाचार मिलते आमतौर पर समाचार कुछ ऐसे होते हैं , फलां प्रदेश की पुलिस ने एनकाउंटर में फलां अपराधी को मार गिराया। या फिर फलां प्रदेश की पुलिस ने फलां अपराधी का एनकाउंटर कर दिया। अब यहाँ समझने वाली बात ये है कि एनकाउंटर में मार गिराना और एनकाउंटर कर देना दोनों वाक्य सुनने में तो एक से लगते हैं किन्तु दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। एनकाउंटर एक अंग्रेजी शब्द है जिसका हिंदी पर्याय है मुठभेड़ ! मुठभेड़ का अर्थ होता है दो पक्षों के मध्य अचानक हुई भिड़ंत या आमने सामने की लड़ाई । अर्थात मुठभेड़ या फिर एनकाउंटर के लिए दो पक्षों का सक्रीय होना आवश्यक है अब फ़र्ज़ करिये की दो विरोधी पक्षों में से एक पक्ष के कुछ हथियारबंद लोग दुसरे पक्ष के किसी निहत्थे आदमी को घेर कर घातक हथियारों से उसकी जान ले लेते है तो क्या यह एनकाउंटर कहलाएगा ? जी नहीं ये निश्चित रूप से हत्या है ! और नृशंष हत्या है !! इसलिए एनकाउंटर का होना तो समझ में आता है लेकिन एनकाउंटर कर दिया गया ये तो समझ से बाहर है !
अब बात करते हैं आज कल के एनकाउंटर की बीते कई सालों से हम समाचारों में तीन प्रकार के एनकाउंटर की ख़बरें देख रहे हैं। पहला प्रकार सेना और आतंकवादियों के बीच या फिर बी एस ऍफ़ और विदेशी घुसपैठियों के बीच होने वाले एनकाउंटर और दूसरा प्रकार , रिज़र्व फोर्सेज और नक्सलियों के बीच एनकाउंटर उरोक्त दोनों ही प्रकार के हर एनकाउंटर में नक्सलियों / आतंकवादियों के साथ साथ सेना और रिज़र्व फोर्सेज के जवान भी शहीद होते हैं और ये स्वाभाविक सी बात है जब गोलियां दोनों तरफ से चल रही हों तो एक ही पक्ष का हताहत होना और दुसरे का पूरी तरह से सुरक्षित होना संभव ही नहीं है अब बात करते हैं तीसरे प्रकार के एनकाउंटर की पुलिस और स्थानीय अपराधियों के बीच एनकाउंटर स्थानीय अपराधियों के साथ पुलिस के एनकाउंटर में सिर्फ अपराधी मरते हैं एकआध पुलिस वाला कभी घायल होता है जब गोली उसके बाजू को हलके से छू कर निकल जाती है । तब इस प्रश्न का उठना लाज़मी है कि क्या हमारे पुलिस वाले , सेना बी एस ऍफ़ , और अन्य तमाम रिज़र्व फोर्सेज के जवानों से अधिक प्रशिक्षित ,अधिक फिट ,अधिक तेज , अधिक साहसी और अधिक सक्षम हैं ? और यदि ऐसा है तो आतंकियों के साथ हर मुठभेड़ में अपनी जान गंवाने वाले सेना और रिज़र्व फोर्सेज के जवानों को लोकल पुलिस में नियुक्त कर देना चाहिए और इन जांबाज़ पुलिस वालों को सेना और रिज़र्व फोर्सेस में भेज देना चाहिए !
लेकिन फिर एक बात आती है 26 / 11 / 2008 के मुंबई अटैक में या फिर दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर में पुलिस वाले कैसे शहीद हुए ? दरअसल ये दोनों एनकाउंटर आतंकवादियों के साथ हुए थे ना कि स्थानीय अपराधियों के साथ ।
इन सब बातों से एक बात स्पष्ट है कि आतंकियों के साथ एनकाउंटर में पुलिस वाले भी शहीद होते हैं किन्तु स्थानीय अपराधियों के साथ एनकाउंटर में अपराधी ही मारा जाता है पुलिस वाले को कुछ नहीं होता तो फिर ऐसी घटना को क्या एनकाउंटर कहना सही होगा ?खासकर जब बिहार में भारत तिवारी की पुलिस द्वारा की गई नृशंष हत्या को सरकार और पुलिस द्वारा बड़ी बेशर्मी से एनकाउंटर कहा जा रहा है सारे साक्ष्य , सारे प्रत्यक्षदर्शी चीख चीख कर कह रहे हैं कि भारत तिवारी ने अपनी पिस्तौल फेंक दी थी और सरेंडर की मुद्रा में खड़ा हो गया था उसके बाद पुलिस ने उस पर गोलियों की बौछार कर दी फिर कह रही है कि भारत तिवारी एनकाउंटर में मारा गया ! भारत तिवारी एनकाउंटर में नहीं मरा ! उसकी हत्या की गई है और पुलिस द्वारा की गई है।
अब जानने की कोशिश करते हैं कि पिछले आठ नौ सालों में ये एनकाउंटर का ट्रेंड इतनी तेजी से कैसे बढ़ा , दरअसल आज से लगभग नौ साल पहले जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की कमान सम्हाली तब अखिलेश सरकार ने प्रदेश की ऐसी स्थिति कर दी थी की उत्तर प्रदेश में माफिया एक सामानांतर सरकार चला रहे थे सपा सरकार की खुली शह से अपराधियों के हौसले इतने बुलंद थे कि वो पुलिस को कुछ समझते ही नहीं थे संगठित अपराध के दम पर सैकड़ों अपराधी विधानसभा और लोकसभा के सदस्य बने बैठे थे। गिरफ्तार किये जाने पर यतो जमानत में छूट जाते या फिर जेल से ऑपरेट करते ,ऐसी स्थिति में इन अपराधियों से निपटने के लिए योगी आदित्यनाथ आदित्यनाथ ने अंतिम अस्त्र के रूप में एनकाउंटर का प्रयोग किया और कुछ ही सालों में यू पी के सारे बड़े माफिया एनकाउंटर के रास्ते अल्लाह मिया को प्यारे हो गए , आप सभी ध्यान दीजियेगा मैंने योगी द्वारा अंतिम अस्त्र के रूप में एनकाउंटर के प्रयोग की बात कही अब यहाँ से आगे बढ़ते हैं एक मुहावरे की और , ‘ किसी समय कहीं एक घोड़ी के खुर में नाल ठोंकी जा रही थी तभी एक मेंढकी पहुँच गई कहने लगे मेरे पैरों में भी नाल ठोको ‘ ये मुहावरा आज इस विषय में अत्यंत प्रासंगिक है क्यों कि योगी की पुलिस की नक़ल यदि हर प्रदेश की पुलिस करेगी तो हर्ष मेढ़की जैसा ही होगा , जैसा कि अब बिहार पुलिस का होने वाला है बिहार की घटना और घोड़ी / मेढ़की के मुहावरे से हर प्रदेश के मुख्यमंत्री को सबक लेना चाहिए की योगी आदित्यनाथ जैसी तेजतर्रार मुख्यमंत्री की छवि पाने के चक्कर उनका हश्र भी मेढ़की जैसा ना हो जाए !
इस सरकारी नक्कारखाने में सरकार के लिए दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियाँ हैं यदि बहरी सर्कार सुने और समझे तो सरकार और जनता दोना का भला होगा।
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।
आज के लिए इतना ही अगली किश्त में फिर विश्लेषण करेंगे एक नए विषय का तब तक के लिए अनुमति दें। यू ट्यूब पर हमारे चैनल को सब्स्क्राइब करें फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हमें लाइक और फॉलो करें आपका बहुत बहुत आभार। उत्तिष्ठ भारत

