जिससे पहले हम आज के विषय का विश्लेषण प्रारम्भ करें मैं आप को प्रकृति की छोटी छोटी दो बातें बताना चाहता हूँ। ये प्रकृति का शास्वत नियम है बढ़ने की गति यदि तीव्र हो तो समाप्ती की गति भी उतनी ही तीव्र होती है उदाहरण के लिए जिन वृक्षों के बढ़ने की गति जितनी तीव्र होती है वो
कमजोर भी बहुत होते हैं और समाप्त भी जल्द हो जाते हैं जैसे कि कदम , सहजन आदि वृक्ष वहीं जो वृक्ष धीमी गति से बढ़ते हैं वो मजबूत भी बहुत होते हैं और दीर्घायु भी जैसे कि बरगद और पीपल के वृक्ष। अब आइये इसी सन्दर्भ में चर्चा करते हैं राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय राजनीती की इसके इतिहास और वर्तमान की।
अट्ठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में पूरे विश्व में साम्राज्य्वादी शक्तियों के विस्तार का दौर था जिसमे कुछ यूरोपीय साम्राज्यों ने पूरे विश्व में अपने साम्राज्य का विस्तार किया और कॉलोनियां बनाई इस कॉलोनीयल युग में फ़्रांस और ब्रिटेन ने सैन्य शक्ति के बल पर कई अफ़्रीकी ,एशियाई और लैटिन अमरीकी देशों को अपना गुलाम बना लिया , बीसवीं शताब्दी में इन साम्राज्य्वादी ताकतों का जाकर विरोध हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ही कॉलोनीयल व्यस्था ढहने लगी इक्कीसवी शताब्दी की आते आते लगभग पूरे विश्व में जनतांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी , साम्राज्य्वादी विस्तार समाप्त हो चुका था।
साम्राजयवाद और विस्तार के उद्देश्य से बलपूर्वक अन्य राष्ट्रों पर सैन्य आक्रमण तो थम गए लेकिन !! शक्तिशाली देशों की क्षुधा नहीं बुझी थी। शीत युद्ध का दौर प्रारम्भ हुआ ! पूरा विश्व अमरीका और सोवियत संघ , दो महाशक्तियों के दो ध्रुवों में बाँट गया शीत युद्ध का दौर एक प्रकार से पूरे विश्व के लिए बेहतर दौर था क्यों कि विश्व में दो महाशक्तियों की मौजूदगी से शक्ति का संतुलन बना हुआ था और दोनों पर एक दुसरे का अंकुश भी था अंतरष्ट्रीय राजनीति में अन्य देशों में किसी एक महाशक्ति द्वारा किये गए राजनैतिक हस्तक्षेप पर दुसरे की त्वरित प्रतिक्रिया होती थी अफगानिस्तान , वियतनाम अदि इसके उदाहरण रहे हैं।
1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद अमरीका एक मात्र महाशक्ति रह गया और निरंकुश भी एक बार फिर कॉलोनीयल युग के शक्तिशाली साम्राज्यों की तरह अमरीका का दुसरे देशों की आंतरिक राजनीती में दखल प्रारम्भ हो गया फर्क बस इतना था कि अन्य देशों की सत्ता पर प्रत्यक्ष कब्जे की जगह उन देशों की सरकार को पूरी तरह से कमजोर कर सत्ता के सूत्र अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले लेना और उन कठपुतली सरकारों को वाइट हाउस से नियंत्रित करना। ऐसा नहीं कि अमरीका हर कमजोर और गरीब देश की सत्ता का नियंत्रण हथियाना चाहता है लेकिन ये अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है कि अमरीका साम्राज्य्वादी नहीं है अतः उसकी भूख क्षेत्रफल बढ़ने की नहीं है इसी लिए सोमालिया ,इथियोपिया , युगांडा जैसे अफ़्रीकी देशों पर उसकी नज़र कभी नहीं रही , उसकी नज़र में वो ही देश होते हैं जहाँ उसे अपने काम के संसाधन मिल सकें या फिर जहाँ के बाजार में वो अमरीकी उत्पादों को खपा सके उद्धरण के लिए अपनी तेल की आपूर्ति के लिए अमरीका ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का पूरा नियन्तण अपने हाथ में रखा है लेकिन ईराक और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादकों द्वारा अमरीका के नियंत्रण को अस्वीकारने का फल ईराक भुगत चुका है और ईरान भुगत रहा है और वेनेज़ुला अपना अस्तित्व ही खो चुका है । ये सभी वो देश हैं जिनकी सत्ता पर अमरीकी नियंत्रण का उद्देश्य तेल की प्राप्ति है इसके अलावा भी कई देश ऐसे हैं जिनकी सत्ता का नियंत्रण अमरीका के हाथ में इसलिए है की उन देशों के बाज़ार में वो अपने उत्पादों को खपा रहा है जैसे की पाकिस्तान , बांगला देश , श्रीलंका जैसे दर्ज़नो कमजोर देश।
समझने वाली बात ये है कि किसी भी देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए अमरीकी हथकंडे क्या होते हैं ? अमरीका और अब तेजी से उभरती हुई विश्व की दूसरी महा शक्ति चीन इन दोनों ही देशों के स्थानीय बाजार में इतनी क्षमता नहीं है कि वहां के पूरे उत्पादों को खपा सके ये दोनों ही देश इस दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक हैं। घरेलु उपभोग की वस्तुएं कृषि , डेयरी उत्पाद से लेकर हथियारों और अन्य रक्षा उत्पादों के विक्रय के लिए ये पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार पर निर्भर हैं और इन्हे बाज़ारों पर कब्जे के लिए अब ये अन्य देशों की सत्ता को भी नियंत्रित करना चाहते हैं और ऐसा नियंत्रण प्राप्त करने के लिए वो सबसे पहले अपने लक्षित देश की सरकार को कमजोर करते हैं और फिर उस सरकार को विस्थापित कर उस देश में एक कठपुतली सरकार बैठा देते है जो सरकार अपना पूरा बाज़ार इनके उत्पादों के लिए खोल देती है। कुछ वर्षों में पकिस्तान में इमरान खान की सरकार को जैसे गिराया गया , श्री लंका और बांगला देश में जो विद्रोह हुआ वो पूरी तरह से बाहरी मुल्कों के हस्तक्षेप का नतीजा था , अब ये ताकतवर देश किसी भी देश की सरकार को कमजोर करने के लिए पहले उस देश की युवा पीढ़ी में आक्रोश पैदा करते हैं फिर उस आक्रोश को विद्रोह में तब्दील कर सरकारों को गिराने का काम करते हैं इस पूरे एक्शन प्लान में उस देश की विपक्षी पार्टियों के नेताओं और मीडिया कर्मियों खासकर सोशल मीडिया के बड़े इन्फ्लुएंसर्स को खरीद लिया जाता है सी आई ए द्वारा एन जी ओस के माध्यम से पानी की तरह पैसे बहाए जाते हैं और बगावत को चरम तक पंहुचाया जाता है। आन्दोलनों के जरिये नए दल का जन्म होता है और फिर सरकार गिरा दी जाती है।
अब विषय के मूल में आते हैं , प्रकृति का जो नियम वृक्षों प् लागू होता है वो राजनीती पर भी लागू होता है की भी आंदोलन से त्वरित रूप से जन्मे राजनैतिक दलों की आयु भी बहुत ही सीमित होती है क्योंकि ये एक तात्कालिक लक्ष्य याने की सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से जन्मते हैं और स्थाई एजेंडे के आभाव में समाप्त हो जाते हैं उदाहरण के लिए भारत में जनता पार्टी , जनता दल ,असम गण परिषद् , मिजो नेशनल फ्रंट और आम आदमी पार्टी जैसे राजनैतिक दल पानी की बुलबुले की तरह विलुप्त हो गए या विलुप्ति के कगार पर हैं , वहीँ नीति सिद्धांतों पर आधारित दल जैसे की कॉंग्रेस , भारतीय जनता पार्टी , वामपंथी दल धीरे धीरे बढे और दीर्घायु हुए।
अब बात करते है देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति की पिछले कुछ वर्षों से और खासकर पिछले कुछ महीनों से अमरीका की वक्र दृष्टि भारत पर है ट्रम्प का भारत की वर्तमान सरकार पर हर प्रकार का दबाव बनाया जा रहा है कि भारत अपना बाजार अमरीकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए पूरी तरह से खोल दे और भारत इसके लिए तैयार नहीं है , भारत पर दबाव बनाने के लिए अमरीका तमाम हथकंडे अपना रहा है लेकिन भारत सरकार है कि झुकने को तैय्यार नहीं है और भला हो भी कैसे ? भारत सरकार भली भाँती जानती है कि भारत की अर्थ व्यसस्था जो पूरी तरह से कृषि आधारित है यदि इसके बाजार में सस्ते अमरीकी कृषि उत्पादों का प्रवेश होता है तो भारत की कृषि पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी। आप कल्पना कीजिये कि भारतीय बाज़ार में अमरीका से आयातित चावल बीस रु किलो गेहूं पंद्रह रु किलो , दूध चालीस रु लीटर में मिलेगा तो भारतीय कृषि उत्पादों और भारतीय किसानों की क्या स्थिति होगी ? इसलिए अमरीका की आर्थिक गुलामी से बचने के लिए भारत सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ अड़ी हुई है जो अमरीका के खूंखार इरादों की आग में घी की तरह है और अब अमरीका भारत में भी तख्ता पलट कर अपने मंसूबों को हासिल करने हेतु पूरी तरह से तत्पर हो गया है।
आज से छह दिन पूर्व याने की 16 मई 2026 को अमरीका में बैठे एक भारतीय व्यक्ति ने अचानक कॉकरोच जनता पार्टी का गठन कर लिया और रातों रात उसके समर्थन का पहाड़ खड़ा हो गया सोशल मीडिया के माध्यम से जन्मी इस पार्टी के डेढ़ करोड़ फॉलोवर्स खड़े हो गए आज के इस दौर में जब आई टी अपने चरम पर है तो सोशल मीडिया का महत्त्व भी चरम पर है और इस डिजिटल युग में डिजिटल मार्केटिंग भी अपने पूरे शबाब पर है तो फिर क्या ही अचरज की बात होगि यदि इस प्रपोगेंडा वार के नए टूल कॉकरोच जनता पार्टी की डिजिटल मार्केटिंग में करोड़ों डॉलर बहे हों बहरहाल अमरीका जानता है कि भारतीय लोकतंत्र पकिस्तान , श्रीलंका या फिर बांग्लादेश की तरह कमज़ोर नहीं है इसकी जड़ें बहुत मज़बूत हैं फिर भी देश की तरुणाई अर्थात जेन ज़ी के जोश और प्राकृतिक आक्रोश को हथियार बनाकर भारत की सरकार को कमज़ोर करने का आगाज़ तो अमरीका से हो गया है। अब ये हम पर है कि इस अमरीकी हथकंडे का जवाब हम कैसे देते हैं ?
फिलहाल वक्त है कि हर भारतीय नागरिक अपनी पूरी चेतना के साथ जगृत रह कर दुश्मन की हर चाल को बारीकी से देखे समझे और प्रतिकार भी करे।

