पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों के नतीजों आज चौथे दिन भी राज्य में हिंसक घटनाओं का क्रम रुका नहीं है फिर वो चाहे तृणमूल कांग्रेस के कार्यालय में तोड़ फोड़ की घटना हो या फिर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुवेंदु अधिकारी के निज सहायक चन्द्रनाथ रथ की हत्या की घटना हो इसके अतिरिक्त उत्तरी चौबीस परगना में आर जे कर मेडिकल कॉलेज की पीड़िता की मान और अब बी जे पी की विधायक रत्ना देबनाथ के घर के बहार बम धमाके , हावड़ा के शिबपुर में टी एम सी कार्यकर्तों द्वारा बमबारी करते हुए अल्लाहू अकबर के नारे लगना और ऐसी अन्य कई घटनाओं के साथ विधानसभा चुनावों में बहुत बड़े अंतर से हारने वाली पार्टी की नेता का मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र ना देने का अलोकतांत्रिक और अमर्यादित हठ !
आज आवश्यकता है इन सभी घटनाओं के मूल में जा कर इन घटनों के कारण को जानने की।
1977 में पूरे देश की जनता ने इंदिरा गाँधी , कांग्रेस और आपातकाल के अत्याचारों से त्रस्त होकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया , उसी तारतम्य में पश्चिम बंगाल से भी कांग्रेस को विदा कर वामपंथियों को सरकार बनाने का अवसर दिया गया इन वामपंथियों ने 2011 तक पश्चिम बंगाल में में शासन किया। ईर्ष्या और घृणा के आधार पर जन्मा वामपंथ वो वामपंथ जिसकी विचारधारा के मूल में ही लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है , ये सिर्फ ताकत के बल पर सत्ता हथियाने में यकीन रखता हैं !
वो वामपंथ कांग्रेस की गलती से सत्ता पर काबिज हुआ और गलती मिली सत्ता को बरकरार रखने के लिए वामपंथीयों ने बाहुबल का भरपूर सहारा लिया और , ‘ Power flows trough the barell of gun ‘ की नीतियों का पालन करते हुए प्रांत के हर बूथ स्थाई रूप से अपने बाहुबली कार्यकर्ताओं की नियुक्ति कर दी और 1977 के बाद हुए हर चुनाव को इन्होने बम बन्दूक और बारूद के दम पर जीता उन चौतीस सालों में आतंक और हिंसा सहज रूप से चुनाव के अंग बन गए इस बीच कांग्रेस में रह कर और फिर तृण मूल कांग्रेस का गठन का ममता बनर्जी ने वामपंथियों के साथ जबरदस्त संघर्ष किया और अंततः 2011 में वो वामपंथी सरकार को बदलने में सफल हुई , सरकार तो बदल गई लेकिन संस्कार बदलना संभव नहीं था क्यों कि 34 वर्षों से चला आ रहा सरकारी आतंक वाला संस्कार अब सिस्टम का सहज हिस्सा बन चुका था इसलिए ममता बैनर्जी ने भी उन संस्कारों को ही अंगीकार कर लिया और प्रदेश के हर बूथ पर अब टी एम सी के बाहुबलियों का राज हो गया ।
राज्य के विस्तार की दृष्टि से देखा जाय जाए तो इस पृथ्वी पर रावण से बड़ा कोई शासक नहीं हुआ तीनों लोकों के सत्ता की सत्ता के स्वामी रावण को वानर और भालुओं की सेना से परास्त होना पड़ा क्योंकि रावण के मन में साथ के स्थाई होने का बोध उत्पन्न हो गया था जिससे उसके मन में अहंकार उत्पन्न हुआ , शासक के मन अपनी सत्ता के स्थाई होने का बोध ही शासक में मन में अहंकार को जन्म देते हैं और यही अहंकार शासक को निरंकुश बनता है शासक के मन में ईश्वरत्व का बोध जागृत होता है और वो स्वयं को ईश्वर मानाने लगता है। निरंकुश शासक सत्ता के मद में नीतिविरुद्ध , जनविरोधी निर्णय करता है और यही जनविरोधी निर्णय उसके पतन का कारण बनते हैं , पराजय का कारण बनते हैं ! उसका अहंकार उसे पराजय को स्वीकार करने रोकता है और यही भाव उसे अधिक उग्र बनता है आज बंगाल में ममता बैनर्जी की वही स्थिति है वामपंथियों की उत्तराधिकारी बनी ममता बैनर्जी ने वामपंथी परम्पराओं का ही निर्वहन किया और बाहुबल से सत्ता को बरकरार रखने की नीति पर चलीं इसके अतिरिक्त बहुसंख्यकों की फूट और अल्पसंख्यकों की एकता को स्थाई वोट बैंक में परिवर्तित करने के उद्देश्य से अल्पसंख्यक विशेस्कर मुस्लिम तुष्टिकरण के चरम को छू लिया अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल में खुला प्रश्रय उनके आधार कार्ड बनना उनको भारतीय नागरिकता मिलना इतना ही नहीं सामान्य जीवन में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं के अधिकारों का हनन मंदिरों को बंद करना पूजा पर प्रतिबन्ध लगाना और विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं का बलपूर्वक दमन करना इन अत्याचारों से त्रस्त दबी सहमी और कुचली जनता अंततः बागी हुई।
पश्चिम बंगाल की जनता ने विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को एकतरफा बहुमत दे कर सरकार तो बदल दी लेकिन जिस आतंक , हिंसा और भय से त्रस्त होकर सरकार बदली गई वो आतंक हिंसा और भय का वातावरण आज भी बना हुआ है क्योंकि सिर्फ सरकार बदलना पर्याप्त नहीं है बंगाल के संस्कार बदलने होंगे !
जी हाँ बंगाल में संस्कार के वो बीज जो वामपंथियों ने बंगाल की राजनीती में 1977 में बोए और 2011 तक पूरे 34 साल उनको सींचा फिर 2011 से आज तक उनक ममता बनर्जी ने सींचा आज 2026 में वो बीज विशाल वट वृक्ष का रूप ले चुका हैं। आखिर वो कौनसे संस्कार थे जो वामपंथियों द्वारा बोये गए और तृण मूल द्वारा सींचे गए ? निश्चित रूप से वो संस्कार लोकतंत्र में अविश्वास हिंसा और दमन के बल पर सत्ता प्राप्ति के सूत्र हैं जो ममता ने वामपंथ से पैतृक उत्तराधिकार के रूप में स्वीकार कर लिया और हिंसा के बल पर सत्ता का संचालन करती रहीं। आज अपने हाथों से सत्ता निकल जाने के सत्य को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पा रही हैं और अपने कार्यकर्ताओं की हिंसक गतिविधियों को हवा भी दे रही हैं बहरहाल एक दो दिनों में ही सत्ता पूरी तरह से बी जे पी के हाटों में होगी तब इनके कार्यकर्ताओं के लिए हिंसक गतिविधियां इतनी आसान नहीं होगी क्यों कि सत्ता के समर्थन से हिंसा करना और सत्ता के विरुद्ध हिंसा करना दोनों में जमीन आसमान का अंतर है ये तो तय है की भा ज पा की सरकार के अस्तित्व में आते ही तृणमूल कांग्रेस द्वारा प्रायोजित हिंसा पर अंकुश लग जायेगा किन्तु अब भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती होगी 1977 से लेकर अब तक पिछले 49 सालों से जारी दबंगई की राजनीति , बाहुबल की राजनीति हिंसा और दमन की राजनीति के मिज़ाज को बदलना। स्वस्थ और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित लोक कल्याणकारी सरकार का संचालन पंडित दीन दयाल उपाध्याय के अंत्योदय के सिद्धांतों का अनुशीलन से ही भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की राजनीती दशा और दिशा बदल सक

