उत्तिष्ठ भारतः , मैं हूँ राजीव चौबे और आप देख रहे हैं राष्ट्रीय चेतना न्यूज़, आर सी एन में आपका स्वागत है .
आज से हम एक नई श्रृंखला प्रारम्भ कर रहे हैं , ‘ वीर वंदन ‘ इस श्रृंखला में मैं प्रयास करूँगा कि R C N के दर्शकों को नियमित रूप से राष्ट्र पर प्राण न्योछावर करने वाले अदम्य साहसी सैनिकों की वीर गाथाओं से वाकिफ करवाऊं इसी शृंखला की प्रथम कड़ी में आपका परिचय करवा रहा हूँ एक ऐसे जांबाज़ सैनिक फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों से आज 17 जुलाई को जिनकी जयंती है .
परमवीर चक्र (PVC) भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है जो युद्ध के मैदान में अभूतपूर्व वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए दिया जाता है भारत सरकार द्वारा अब तक कुल 21 जांबाज़ सैनकों को ये सम्मान दिया गया है। परम वीर चक्र अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का जज़्बा लिए भारतीय सेना में सेवा देने वाले हर सैनिक का सपना होता है लेकिन इसे पाने वाले बिरले ही होते हैं। तमाम विषम परिस्थितियों में दुर्गमतम क्षेत्रों में जहाँ कहीं तापमान में 52 डिग्री की झुलसा देने वाली गर्मी होती है और कहीं माइनस 55 डिग्री तक की हड्डियां जमा देने वाली कातिल ठण्ड होती है ऐसे क्षेत्रों में जहाँ आम इंसान आधे घंटे भी खड़ा न हो सके वहां ये जवान रात रात भर जग कर हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं इन दुर्गम परिस्थितियों में ये रात भर इसलिए जागते हैं कि हम और आप चैन से सो सकें , सीमाओं पर आने वाले हर संकट को हम तक पहुँचने से पहले वे खुद पर ले लेते हैं और अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिए सीमाओं पर अपने मस्तक बो देते हैं। इस देश के युद्ध इतिहास में ऐसी सैकड़ों घटनाएं हुई हैं जिसमे एक सैनिक अपनी शादी के तत्काल बाद लाम पर चला गया अभी नव वधु के हाथों की मेहँदी भी नहीं उत्तरी थी कि उसके शहीद पति का शव वापस आया और नव वधु ने पूरे श्रृंगार के साथ उन्ही मेहँदी लगे हाथों से अपने शहीद पति की अर्थी को कन्धा दिया। इन शहीदों पर हम जितना भी लिखें जितना भी कहें कम है और मेरी पीढ़ी के लोगों को लिए तो ये अनिवार्य है कि हम अपनी नई पीढ़ी को इन शहीदों की गौरव गाथाएँ सुनाएं।
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों का जन्म 17 जुलाई 1943 को लुधियाना, पंजाब, ब्रिटिश भारत में सेखों जाट सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम फ्लाइट लेफ्टिनेंट तारलोक सिंह सेखों था। बचपन में उन्हें महान सिख योद्धा हरि सिंह नलवा की बहादुरी की कहानियां सुनना बहुत पसंद था , इन कहानियों ने उनके मन में देश प्रेम का मजबूत बीज बोया , उनके पिता भारतीय वायु सेना में थे उनके पिता अक्सर उन्हें सेना के जीवन और उड़ान के किस्से सुनाते थे इससे उन्हें नीली वर्दी पहनने और देश की सेवा करने की प्रेरणा मिली उनका घर हलवारा वायुसेना स्टेशन के करीब था जब भी कोई लड़ाकू विमान आसमान से गुजरता था, वह सब कुछ छोड़कर उसे ध्यान से देखते थे उन्हें बचपन से ही पक्का यकीन था कि वह बड़े होकर आसमान में उड़ेंगे देश भक्ति , वायु सेना की सेवा और उसे अदम्य साहस के साथ निर्वाह करने का जूनून उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला था। उन्हें 4 जून 1967 को 24 वर्ष की उम्र में पायलट अधिकारी के रूप में भारतीय वायुसेना में सम्मिलित किया गया था ।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वह भारतीय वायुसेना की “द फ्लाइंग बुलेट” 18वीं स्क्वाड्रन में काम कर रहे थे। 14 दिसम्बर 1971 को श्रीनगर हवाई अड्डे पर पाकिस्तान वायु सेना के एफ-86 जेट विमानों ने हमला किया पकिस्तान को अमरीका से मिले सेबर जेट उस समय के आधुनिकतम लड़ाकू जेट विमान थे जिनसे पूरा विश्व खौफ खाता था लेकिन युद्ध का एक शास्वत नियम है युद्ध में अस्त्र शस्त्र और सवारी से अधिक योद्धा का आत्मबल और शौर्य काम करता है यही उस दिन हुआ अत्याधुनिक सेबर जेट का मुकाबला भारतीय वायु सेना के ऐसे योद्धा से हो गया जो गुरु गोविन्द सिंह जी की परिपाटी का सिंह था। सुरक्षा टुकड़ी की कमान संभालते हुए फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों वहाँ पर 18 नेट स्क्वाड्रन के साथ तैनात थे। एयरफील्ड में एकदम सवेरे काफ़ी धुँध थी। सुबह 8 बजकर 2 मिनट पर दुश्मन के आक्रमण की चेतावनी मिली निर्मलसिंह तथा घुम्मन ने दस सेकेण्ड के बाद आदेश की प्रतीक्षा के बिना उड़ जाने का निर्णय लिया। ठीक 8 बजकर 4 मिनट पर दोनों वायु सेना अधिकारी दुश्मन का सामना करने के लिए आसमान में थे। उस समय दुश्मन का पहला F-86 सेबर जेट एयर फील्ड पर गोता लगाने की तैयारी कर रहा था। जैसे ही निर्मलजीत सिंह का नेट उड़ा, रन वे पर उनके ठीक पीछे एक बम आकर गिरा। घुम्मन उस समय खुद एक सेबर जेट का पीछा कर रहे थे। सेखों ने हवा में आकार दो सेबर जेट विमानों का सामना किया, इनमें से एक जहाज वही था, जिसने एयरफील्ड पर बम गिराया था। बम गिरने के बाद एयर फील्ड से कॉम्बैट एयर पेट्रोल का सम्पर्क सेखों तथा घुम्मन से टूट गया था। सारी एयरफिल्ड धुएँ और धूल से भर गई थी, जो उस बम विस्फोट का परिणाम थी। इस सबके कारण दूर तक देख पाना कठिन था। तभी फ्लाइट कमाण्डर स्क्वाड्रन लीडर पठानिया को नजर आया कि कोई दो हवाई जहाज मुठभेड़ की तौयारी में हैं। घुम्मन ने भी इस बात की कोशिश की, कि वह निर्मलजीत सिंह की मदद के लिए वहाँ पहुँच सकें लेकिन यह सम्भव नहीं हो सका। तभी रेडियो संचार व्यवस्था से निर्मलजीत सिंह की आवाज़ सुनाई पड़ी…”मैं दो सेबर जेट जहाजों के पीछे हूँ…मैं उन्हें जाने नहीं दूँगा…”
उसके कुछ ही क्षण बाद नेट से आक्रमण की आवाज़ आसमान में गूँजी और एक पाकिस्तानी सेबर जेट आग में जलता हुआ गिरता नजर आया। तभी निर्मलजीत सिंह सेखों ने अपना सन्देश प्रसारित किया…
“मैं मुकाबले पर हूँ और मुझे मजा आ रहा है। मेरे इर्द-गिर्द दुश्मन के दो सेबर जेट हैं। मैं एक का ही पीछा कर रहा हूँ, दूसरा मेरे साथ-साथ चल रहा है।” इसके बाद नेट से एक और धमाका हुआ जिसके साथ फिर पाकिस्तानी सेबर जेट के ध्वस्त होने की आवाज़ आई। उनका निशाना फिर लग गया था और एक बड़े धमाके के साथ दूसरा पाकिस्तानी सेबर जेट भी ढेर हो गया। कुछ देर की शांति के बाद फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों का सन्देश फिर सुना गया। उन्होंने कहा.. “शायद मेरा जेट भी निशाने पर आ गया है… घुम्मन, अब तुम मोर्चा संभालो।”
‘ कर चले हम फ़िदा जानों तन साथियों , अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों ‘ या फिर
,सूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत, पुरजा पुरजा कट मरे, कबहुँ न छाड़े खेत !
कुछ इसी अंदाज़ में दसमेश गुरु गोविन्द सिंह के इस सिंह निर्मलजीत सिंह शेखों का यह अंतिम सन्देश था ! फिर वह अपने नेट के साथ भारतीय क्षेत्र में ही गिरे और अपनी मिटटी में मिल कर मिटटी हो गए , वीरगति को प्राप्त हो गए !लेकिन उनकी जांबाज़ी और बलिदान ने श्रीनगर को बचा लिया। उनके अदम्य सहस और अप्रतिम शौर्य के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया। परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले वे वायुसेना के एकमात्र अधिकारी हुए।
ऐसे परम साहसी योद्धा की जयंती पर RCN परिवार उनकी वीरगति को कोटिशः नमन करता है। आज के लिए इतना ही अगली किश्त में फिर मिलेंगे तब तक के लिए अमुमति दें , यूट्यूब पर हमारे चैनल को सब्स्क्राइब करें फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हमें फॉलो करें आपका बहुत बहुत आभार धन्यवाद उत्तिष्ठ भारतः

