छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली, पंडवानी गायन की अप्रतिम साधिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन से केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला जगत में शोक की लहर है। दुर्ग जिले के गनियारी गांव से शुरू हुआ उनका संघर्ष आज करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है। सामाजिक बंधनों को चुनौती देते हुए उन्होंने हाथ में तंबूरा उठाया और महाभारत के पात्रों को अपनी बुलंद आवाज, दमदार अभिनय और अद्भुत अभिव्यक्ति से जीवंत कर दिया। यही उनकी पहचान बनी और यही उनकी अमर विरासत।
गुरु उमेद सिंह देशमुख से पंडवानी की शिक्षा लेने वाली तीजन बाई ने गांव-गांव से शुरू हुई अपनी कला को देश और विदेश तक पहुंचाया। भोपाल के भारत भवन में उनकी प्रस्तुति ने प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति का अवसर दिलाया। इसके बाद श्याम बेनेगल के धारावाहिक भारत एक खोज में दिखाई देने के बाद उनकी लोकप्रियता नई ऊंचाइयों पर पहुंच गई। वर्ष 1986 में भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी मिली और फिर पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण, जापान का फुकुओका पुरस्कार और अंततः देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण सहित अनेक सम्मानों से उन्हें नवाजा गया।
डॉ. तीजन बाई केवल एक कलाकार नहीं थीं, बल्कि नई पीढ़ी की गुरु, प्रेरणा और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान थीं। उनके दत्तक पुत्र अलीम बंसी और शिष्या पद्मश्री उषा बारले सहित अनगिनत कलाकारों ने उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी। “एकर का भरोसा चोला माटी के हां…” की गूंज के बीच हर आंख नम थी। उनका शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन पंडवानी की वह अमर आवाज, महाभारत के पात्रों का उनका जीवंत अभिनय और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में दिलाई गई पहचान सदियों तक याद की जाएगी।
डॉ. तीजन बाई ने साबित किया कि सच्ची प्रतिभा किसी सीमा की मोहताज नहीं होती। गनियारी की मिट्टी से उठी यह बेटी विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ का गौरव बनी और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का दीप जला गई। पंडवानी की यह स्वर-कोकिला अब भले ही हमारे बीच न हो, लेकिन उनकी बुलंद आवाज, उनकी कला और उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा। पूरा प्रदेश और पूरा देश इस महान लोक कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

