छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला की नगपुरा ग्राम पंचायत से एक ऐसा मामला सामने आया है…
जो सिर्फ एक सड़क का नहीं… बल्कि पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

यहां एक 40 फीट से भी चौड़ी सरकारी सड़क…
जो सरकारी रिकॉर्ड और नक्शों में आज भी साफ़ दर्ज है…
ज़मीन पर पूरी तरह गायब हो चुकी है।

जी हां… वो सड़क, जो कभी लोगों के आने-जाने का मुख्य रास्ता हुआ करती थी…
आज वहां पक्के मकान खड़े हैं…
और अवैध कब्ज़ा करने वालों ने उस रास्ते को पूरी तरह निगल लिया है।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब कुछ एक दिन में नहीं हुआ…
बल्कि धीरे-धीरे, खुलेआम हुआ…
और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।

नागपुरा निवासी बिमला बाई महोबिया…
जिनकी खसरा नंबर 1608 के तहत करीब पौन एकड़ ज़मीन दर्ज है…
उनकी इस ज़मीन तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यही 40 फीट चौड़ी सड़क थी।

लेकिन आज हालत यह है कि वह रास्ता कागज़ों में तो जिंदा है…
मगर ज़मीन पर उसका अस्तित्व पूरी तरह मिट चुका है।

बिमला बाई और उनका परिवार अब अपने ही प्लॉट तक पहुँचने के लिए संघर्ष कर रहा है…
और न्याय की आस में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।

सूत्रों की मानें तो इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है…

बताया जा रहा है कि जिन लोगों ने इस सरकारी सड़क पर अवैध कब्ज़ा किया…
उन्हीं में से कुछ को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अनुदान राशि भी दी जा चुकी है।

यानी एक तरफ सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा…
और दूसरी तरफ उसी कब्ज़े पर सरकारी लाभ…

अब सवाल यह उठता है…
क्या यह सिर्फ लापरवाही है…
या फिर इसके पीछे कोई बड़ी मिलीभगत छिपी हुई है?

जब रिकॉर्ड में सड़क मौजूद है…
जब नक्शा साफ़ तौर पर रास्ता दिखा रहा है…
तो फिर ज़मीन पर उस सड़क को खत्म होने कैसे दिया गया?

क्या प्रशासन ने आंखें मूंद ली थीं…
या फिर सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साध ली गई?

अब सबसे बड़ा सवाल…
क्या दुर्ग प्रशासन इस मामले में खुद संज्ञान लेगा?
क्या अवैध कब्ज़ों पर कार्रवाई होगी?
और क्या बिमला बाई को उनका हक़ वापस मिलेगा?

क्योंकि यह सिर्फ एक महिला की लड़ाई नहीं है…
यह सवाल है सिस्टम की जवाबदेही का…
यह सवाल है न्याय का…
और यह सवाल है उस भरोसे का…
जो आम जनता प्रशासन से रखती है।

By editor