एग्जिट पोल के एकतरफा आंकड़ों और ममता की बेचैनी का आधार क्या है ??

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की मतगणना कल चार मई 2026 को संपन्न होगी पांच में से चार राज्यों के परिणामों को लेकर जनता में कोई विशेष कौतुहल नहीं है चार राज्यों के परिणाम मतदान से पूर्व ही स्पष्ट हो चुके थे किन्तु जिस राज्य के परिणाम पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं वो है पश्चिम बंगाल , गुरुदेव रबिन्द्र नाथ ठाकुर का बंगाल , शरतचंद्र और बंकिम चंद्र का बंगाल ,रामकृष्ण परमहंस का बंगाल ,  स्वामी विवेकानंद का बंगाल , राजा राममोहन रॉय का बंगाल ,नेता जी सुभाषचंद्र बोस का बंगाल ,खुदीराम बोस का बंगाल ,डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बंगाल , सत्यजीत रे का बंगाल , बिमल रॉय का बंगाल  प्रणब मुखर्जी का बंगाल ,मन्ना डे का बंगाल ,  उत्तम कुमार का बंगाल , सुचित्रा सेन का बंगाल , बुला चौधरी का बंगाल  , संगीत साहित्य और संस्कृति से सर्वाधिक संपन्न बंगाल चारु मजूमदार और कनु सान्याल का बंगाल , नक्सलवाद का जनक बंगाल , ज्योति बासु का बंगाल फिलहाल ममता दीदी का बंगाल !!

बंगाल के चुनाव परिणामों को लेकर एक दर्ज़न एग्जिट पोल आ चुके है जिनमे से 90 प्रतिशत से अधिक एग्जिट पोल भा ज पा के पक्ष में स्पष्ट बहुमत दर्शा रहे हैं फिर भी भारत की जनता इसे सहज रूप से स्वीकार नहीं रही है आज भी बंगाल के परिणामों को लेकर जनता के मन में संशय है और इस संशय का ठोस आधार भी है , वो है बंगाल की राजनैतिक शैली ! पिछले कई वर्षों से भारत भर में राजनैतिक और चुनावी हिंसा में बंगाल अव्वल नंबर पर स्थिर है पिछले कई वर्षों से यहाँ चुनाव सत्ताधारी दल के द्वारा प्रयोजत हिंसा के आतंक के साये में ही संपन्न हुए हैं 22 वर्षों के साम्यवादी शासन को विस्थापित करने के लिए ममता दीदी के कार्यकर्ताओं ने भी वर्षों तक शोणित सरिताएँ बहाई थी तब जा कर कम्युनिस्ट पार्टी सत्त्ताच्युत हुई और तृणमूल कांग्रेस की साकार बनी ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस तृणमूल का शाब्दिक अर्थ है घास की जड़ वो घांस की जड़ धरती पर जिसकी पकड़ संसार में सबसे मजबूत होती है , तो तृणमूल की तरह ही ममता दीदी की पार्टी की जड़ें पश्चिम बंगाल की मिटटी में बहुत मजबूती से धसी हुई हैं।

ऐसे में आम जन के लिए  मात्र एग्जिट पोल के आधार पर तेजतर्रार जिद्दी जुझारू बोल्ड और डैशिंग मोमता दी की पराजय को सहज स्वीकारना कठिन हो रहा है।  अब आइये हम विश्लेषण करते हैं एग्जिट पोल के आंकड़ों और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के मूड का दरसल किसी राज्य या देश में सत्ता परिवर्तन का मूल आधार होता है एंटी इकम्बेंसी याने की सत्ताधारी दल के विकास कार्यों के से , सत्ताधारी दल के नेताओं के जनता से दूर होने से , प्रशासनिक कसावट में कमी से , महंगाई और बेरोजगारी से जनता की असंतुष्टि और विपक्ष द्वारा सत्ताधारी दल के विरुद्ध निर्णायक आंदोलन  लेकिन चुनावों को लेकर यहाँ इन विषयों में कोई भी उल्लेखनीय तथ्य बंगाल में नहीं दीखता जनता विकास कार्यों को लेकर सरकार से कुछ ख़ास नाराज़ नहीं दिखती ना ही विपक्षी दलों ने पिछले पांच वर्षों  जमीनी स्तर पर कोई बहुत बड़े आंदोलन किये फिर भी एग्जिट पोल के ट्रेंड तृणमूल कांग्रेस के सत्ताच्युत होने के संकेत दे रहे हैं तो फिर ऐसा कौन सा कारण है जो इन संकेतों का मूल आधार है।
यदि ये संकेत सही हैं तो इसके पीछे मूल वजह है पश्चिम बंगाल की बदलती हुई डेमोग्राफी
ममता देदी की शासन में पिछले पंद्रह सालों में जिस तरह राज्य की डेमोग्राफी बदली है और राज्य में मुसलामानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है उसका मूल कारण रहा है बांग्लादेश से आये अवैध घुसपैठियों को राज्य सरकार का खुला प्रश्रय और उन सभी घुसपैठियों को सरलता से भारतीय नागरिक के रूप में मान्यता देते हुए उनको समस्त शासकीय दस्तावेज़ उपलब्ध करने की तृणमूल कांग्रेस की नीति , शासन की प्रत्येक योजना में लाभार्थी के रूप में अवैध घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल के मूल नागरिकों के बराबर लाभ दिया जाना और इससे उपजी मूल नागरिकों के अधिकारों के हनन की विभीषिका उसपर से शासकीय गुंडागर्दी के आतंक से नागरिकों द्वारा विरोध दर्ज़ ना कर सकने की विवशता।
इस संसार का इतिहास साक्षी है कि जब भी सत्ता निरंकुश हुई है और जनता दबाई कुचली गई है और जनता ने तत्काल प्रतिकार नहीं किया है   खड्ग के भय से दबी जनता के मन में उबलते आक्रोश ने समय आने पर ज्वालामुखी का ररो लिया है और उस ज्वाला मुखी के विस्फोट से बहने वाले लावे में बड़े से बड़े बलशाली सम्राटों के सिंहासन भी तिनके की तरह बह गए हैं।  राष्ट्रकवी रामधारी सिंह दिनकर ने कुरुक्षेत्र में लिखा है ……………

सुख का सम्यक्-रूप विभाजन
संभव नहीं जहाँ नीति से, नय से  ,
 अशान्ति दबी हो जहाँ खड्ग के भय से,

जहाँ पालते हों अनीति-पद्धति
को सत्ताधारी,
जहाँ सुत्रधर हों समाज के
अन्यायी, अविचारी;

जहाँ खड्ग-बल एकमात्र
आधार बने शासन का;
दबे क्रोध से भभक रहा हो
हृदय जहाँ जन-जन का;

सहते-सहते अनय जहाँ
मर रहा मनुज का मन हो;
समझ का पुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो;

अहंकार के साथ घृणा का
जहाँ द्वन्द्व हो जारी;
ऊपर शान्ति, तलातल में
हो छिटक रही चिनगारी;

आगामी विस्फोट काल के
मुख पर दमक रहा हो;
इंगित में अंगार विवश
भावों के चमक रहा हो;

पढ कर भी संकेत सजग हों
किन्तु, न सत्ताधारी;
दुर्मति और अनल में दें
आहुतियाँ बारी-बारी;

कभी नये शोषण से, कभी
उपेक्षा, कभी दमन से,
अपमानों से कभी, कभी
शर-वेधक व्यंग्य-वचन से।

दबे हुए आवेग वहाँ यदि
उबल किसी दिन फूटें,
संयम छोड़, काल बन मानव
अन्यायी पर टूटें;

ये तय है कि कल यदि ममता दीदी का सिंहासन डोलता है तो  निरंकुश सत्ता का अहंकार , नागरिक अधिकारों का हनन और विदेशी घुसपैठ को प्रश्रय दे कर विदेशियों को अपने नागरिकों के अधिकार छीनने की  क्षमता प्रदान करने की राष्ट्रविरोधी नीति ही इसकी मुख्य वजह होगी। 

By editor