छत्तीसगढ़ में मजदूर दिवस के मौके पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel ने बोरे-बासी खाने के बाद राज्य सरकार के ‘सुशासन’ पर तीखा हमला बोला है।
बघेल ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ‘सुशासन तिहार’ में किया क्या जाता है?
उन्होंने प्रदेश के पारंपरिक त्योहारों—हरेली, तीजा, पोरा और दिवाली—का जिक्र करते हुए कहा कि इन सभी त्योहारों की अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक महत्व है।
दिवाली में दीप जलते हैं, होली में रंग खेला जाता है,
लेकिन ‘सुशासन तिहार’ का उद्देश्य क्या है, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि
प्रदेश में गौठानों की स्थिति चिंताजनक हो गई है,
जहां अब शराब भट्टियां खोले जाने की बात सामने आ रही है।
इसके साथ ही बघेल ने बिजली बिलों में भारी बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया
और कहा कि आम जनता, खासकर गरीब और मजदूर वर्ग, इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
उन्होंने मनरेगा को लेकर भी सरकार को घेरा और कहा कि
काम ठप पड़ने की वजह से नौजवान और मजदूर रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं।
बघेल ने तीखा सवाल करते हुए कहा—
क्या मजदूरों की अनदेखी करना ही सुशासन की परिभाषा है?
हालांकि, बघेल के इन आरोपों पर राज्य सरकार की ओर से भी कड़ा पलटवार सामने आया है।
कैबिनेट मंत्री Gajendra Yadav ने पूर्व मुख्यमंत्री के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें सच्चाई का आईना दिखाने की बात कही।
मंत्री गजेंद्र यादव ने कहा कि
भूपेश बघेल की सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों और मजदूरों के हक के लगभग ढाई लाख मकानों को रोक कर रखा था,
जो जरूरतमंद परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे।
उन्होंने दावा किया कि वर्तमान सरकार अब प्रदेश में 26 लाख आवासों के निर्माण का काम तेजी से कर रही है,
जिससे लाखों गरीब परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा।
बिजली बिल के मुद्दे पर जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि
सरकार 250 यूनिट तक मुफ्त बिजली उपलब्ध करा रही है,
जो एक सामान्य मजदूर परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।
मंत्री यादव ने बघेल के सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि
पूर्व मुख्यमंत्री केवल राजनीतिक लाभ के लिए बयानबाजी कर रहे हैं,
जबकि वास्तविकता यह है कि वर्तमान सरकार मजदूरों और गरीबों के हित में ठोस और जमीनी स्तर पर काम कर रही है।
छत्तीसगढ़ में मजदूर दिवस के मौके पर
जहां एक ओर बोरे-बासी के जरिए परंपरा और संस्कृति की बात हो रही है,
वहीं दूसरी ओर ‘सुशासन’ को लेकर सियासत भी अपने चरम पर पहुंच गई है।

