छत्तीसगढ़ के भिलाई नगर निगम में इन दिनों प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव ने एक बड़ा संवैधानिक रूप ले लिया है।
मामला अब सिर्फ मतभेद का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिकारों की सीधी चुनौती बन चुका है।
25 मार्च 2026 को नगर पालिक निगम की सामान्य सभा में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया।
छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 54(2) के तहत, निर्वाचित पार्षदों ने तीन-चौथाई बहुमत से निगम आयुक्त को पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
नियमों के अनुसार, इस प्रस्ताव के पारित होते ही आयुक्त को पदमुक्त माना जाता है।
यानी उनके पास किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या नीतिगत शक्ति शेष नहीं रहनी चाहिए।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसके बावजूद आयुक्त द्वारा लगातार फैसले लिए जा रहे हैं।
पार्षदों का आरोप है कि हटाए जाने के बाद भी आयुक्त न केवल प्रशासनिक आदेश जारी कर रहे हैं, बल्कि ठेकेदारों के भुगतान जैसी वित्तीय प्रक्रियाओं को भी आगे बढ़ा रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह पूरी तरह अवैध है और सामान्य सभा के सामूहिक निर्णय का खुला उल्लंघन है।
उनके अनुसार, यह कदम लोकतांत्रिक मर्यादा और निगम की स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अब पार्षदों ने शासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि 25 मार्च के बाद आयुक्त द्वारा लिए गए सभी फैसलों को तत्काल प्रभाव से “शून्य” घोषित किया जाए।
साथ ही, यह भी मांग उठाई गई है कि आयुक्त को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई करने से तुरंत रोका जाए और उनकी जगह किसी सक्षम अधिकारी की नियुक्ति की जाए।
ताकि नगर निगम का कामकाज कानून के दायरे में और सुचारू रूप से चलता रहे।
पार्षदों ने चेतावनी दी है कि यदि इस पूरे मामले में जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल जनप्रतिनिधियों के अधिकारों का हनन होगा, बल्कि नगर निगम की पूरी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो जाएंगे।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन इस बढ़ते टकराव पर क्या रुख अपनाता है…
और क्या लोकतंत्र की आवाज को वाकई न्याय मिल पाता है…?

