राम नवमी के दिन दुर्ग में कन्या भोज के लिए गई 6 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के जघन्य अपराध की घटना ने पूरे ट्विन सिटी को दहला दिया है , ये अलग विषय है कि पुलिस की तत्परता से 24 घण्टे के अंदर अपराधी का पता भी चल गया और अपराधी गिरफ्तार भी हो गया। आज अपराधी को अदालत में प्रस्तुत किया जायेगा कल उसपर मुकदमा चलेगा वो बरी होगा या उसे सजा होगी ये भविष्य के गर्भ में है।
मासूम के साथ दुष्कर्म और उसकी निर्मम हत्या की घटना पर कुछ दिनों तक चर्चा होगी कुछ विरोध प्रदर्शन होंगे कुछ राजनीति होगी विपक्ष सत्ता पक्ष को कोसेगा , समाज सेवी जागृत होंगें , कुछ मोम बत्तियां जलेंगी , कुछ कैंडल मार्च , संवेदनाओं में उबाल , उस उबाल की ऊष्मा से समाज का स्टीम बाथ और बस ! फिर अगली घटना का इंतज़ार।
प्रदेश एक प्रमुख समाचार में आज की खबर है कि दुर्ग जिले में पिछले 5 सालों में दुष्कर्म के 812 और यौन उत्पीड़न के 144 प्रकरण दर्ज हुए हैं। जबकि दुष्कर्म के मामलों में सामाजिक लोकलिहाज के दर से बहुतेरे प्रकरण दर्ज ही नहीं किये जाते।
आज की तारिख में अहम् प्रश्न ये है ऐसी घटनाओं पर स्थाई निषेध के उपायों पर चर्चा कब होगी ? जब भी ऐसी घटना होती है विपक्ष सत्ता को कोस कर समाजसेवी धरना प्रदर्शन कैंडल मार्च कर , समाज संवेदनाएं प्रकट कर और पुलिस की नाकामी बता कर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेता है। किन्तु इस गंभीर समस्या के स्थाई निराकरण के उपायों पर चिंतन कभी नहीं होता।
दिल्ली में निर्भया कांड के बाद पूरे देश में बवाल मचा आनन् फानन में नए और सख्त कानून भी बने दुष्कर्म के लिए अति सख्त सजाओं के प्रावधान हुए ! नतीजा ? ?
क्या दुष्कर्म की घटनाओं में कमी आई ? इस देश में हत्या के अपराध के लिए सबसे सख्त सजा का प्रावधान है वो है फांसी की सजा क्या इतनी सख्त सजा के दर से हत्या के अपराध बंद हुए ? कम हुए ? दरअसल सजा अपराधोत्तर व्यवस्था है ये अपराध को रोकने के लिए नहीं बल्कि अपराधी को दण्डित करने की व्यवस्था है। सरकार , पुलिस , कानून व्यवस्था न्याय पालिका ये सब मिलकर अपराध को होने से नहीं रोक सकते, ये तो सिर्फ अपराधी को पकड़ कर दण्डित करने की व्यवस्था कर सकते हैं। दुराचार की घटनाओं को कानून व्यवस्था की खामी बता कर समाज अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि दुराचार कानून व्यस्था की समस्या न होकर एक सामजिक समस्या है।
दुराचार एक सामजिक समस्या है , मानवीय विकृति है जिसे समाज और परिवार द्वारा प्रत्येक पुरुष सदस्य में नारी के प्रति सम्मान के संस्कारों का रोपण करके ही नियंत्रित किया जा सकता है। हमारी भारतीय संस्कृति ही है जो अदि काल से हमें यही संस्कार देती रही है। जिस संस्कृति ने नीति , सिद्धांत और आदर्शों को सर्वाधिक मूलयवान सम्पदा मानने वाले संस्कार दिए जिस संस्कृति ने धन , ज्ञान और शक्ति तीनो सम्पदाओँ की अधिष्ठात्री के रूप में मातृ शक्ति को स्थापित किया , 33 कोटि देवों में अर्धनारीश्वर को महादेव माना जिस संस्कृति ने , ” यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ” को सामजिक संरचना का मूलमंत्र माना जिस संस्कृति को 1000 वर्ष के विदेशी शासन भी कमजोर न कर सका उस संस्कृति को पिछले 30 सालों में 32 इंच के टी वी नामक डिब्बे ने इतना रौंदा है क़ि ये पूर्णतः विकृत होने की कगार पर है। जहाँ रोज टी वी में दिखाया जा रहा हो की एक स्त्री एक पुरुष के लिए नहीं है , एक पुरुष एक स्त्री के लिए नहीं है , शादियों का टूटना साधारण बात है तलाक रोजमर्रा के जीवन की साधारण घटना है टी वी सीरियल्स सिनेमा और वेब सीरीस में सेक्स हिंसा और अश्लीलता के चरम से ग्रसित युवा ही दुराचार जैसे अपराधों को अंजाम दे रहा है इसीलिए दुराचार ! समाज में श्रेष्ठ चिंतन के आभाव , अपनी संस्कृति के अवमूल्यन तथा पाश्चात्य संस्कृति के अंधे अनुकरण से उपजा विष है। जिसका उपाय हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्प्रतिस्थापन के अलावा कुछ भी नहीं है।

